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कानूनों की समझ

कानूनों की समझ

कक्षा 8 अध्याय 3. कानूनों की समझ

क्या कानून सब पर लागू होते हैं?

संविधान के अनुसार स्वतन्त्र भारत में सभी लोग कानून की नज़र में बराबर होंगे। हमारा कानून धर्म, जाति और लिंग के आधार पर लोगों के बीच कोई भेदभाव नहीं करता। इसलिए कानूनों की समझ होना व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है।

कानून के शासन का मतलब है कि सभी कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं।

किसी भी अपराध या कानून के उल्लंघन की एक निश्चित सजा होती है। सजा तक पहुँचने की भी एक तय प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति का अपराध साबित किया जाता है।

प्राचीन भारत में असंख्य स्थानीय कानून थे। अकसर एक जैसे मामले में कई तरह के स्थानीय कानून लागू होते थे।

विभिन्न समुदाय की इन कानूनों को अपने अधिकार क्षेत्र में अपनी समझ के हिसाब से लागू करने के लिए आजाद थे।

कुछ मामलों में जाति के आधार पर एक ही अपराध के लिए अलग-अलग व्यक्ति को अलग-अलग सजा दी जाती थी।

बहुत सारे लोग मानते हैं कि हमारे देश में कानून के शासन की शुरुआत अंग्रेजों ने की थी। इतिहासकारों में इस बात पर काफी विवाद रहा है।

इसका एक कारण तो यह है कि औपनिवेशिक कानून मनमानेपन पर आधारित था। दूसरा कारण यह बताया जाता है कि ब्रिटिश भारत में क़ानूनी मामलों के विकास में भारतीय राष्ट्रवादियों ने एक अहम् भूमिका निभाई थी।

1870 का राजद्रोह एक्ट अंग्रेजी शासन के मनमानेपन की मिसाल था। इस कानून में राजद्रोह की परिभाषा बहुत व्यापक थी।

इसके अनुसार अगर कोई भी व्यक्ति ब्रिटिश सरकार का विरोध या आलोचना करता था तो उसे मुक़दमा चलाए बिना ही गिरफ्तार किया जा सकता था।

भारतीय राष्ट्रवादी अंग्रेजों द्वारा सत्ता के इस मनमाने इस्तेमाल का विरोध और उसकी आलोचना करते थे। यह समानता का संघर्ष था।

औपनिवेशिक शासन के दौरान कानून के शासन के विकासक्रम में यहाँ के लोग भी कई तरह से अपना योगदान दे रहे थे।

संविधान को स्वीकृति मिलने के बाद यह दस्तावेज एक ऐसी आधारशिला बन गया जिसके आधार पर हमारे प्रतिनिधि देश के लिए कानून बनाने लगे।

2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन कानून बनाया गया। इस कानून के अनुसार बेटे, बेटियाँ और उनकी माँ, तीनों को परिवार की संपत्ति में बराबर हिस्सा मिल सकता है।

नए कानून किस तरह बनते हैं?

कानून बनाने में संसद की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। यह प्रक्रिया कई तरह से आगे बढ़ती है। आमतौर पर सबसे पहले समाज ही किसी खास कानून के लिए आवाज उठाते हैं।

जब परिवार का कोई पुरुष सदस्य (आमतौर पर पति) घर की किसी औरत (आमतौर पर पत्नी) के साथ मारपीट करता है, उसे चोट पहुँचाता है या मारपीट अथवा चोट की धमकी देता है तो सामान्यतः से घरेलू हिंसा कहा जाता है।

औरत को यह नुकसान शारीरिक मारपीट या भावनात्मक शोषण के कारण पहुँच सकता है। यह शौषण मौखिक, यौन या फिर आर्थिक शोषण भी हो सकता है।

घरेलू हिंसा कानून, 2005 में महिलाओं की सुरक्षा की परिभाषा ने घरेलू शब्द की समझ को और अधिक व्यापक बना दिया है। अब ऐसी महिलाएँ भी ‘घरेलू’ दायरे का हिस्सा मानी जाएँगी जो हिंसा करने वाले पुरुष के साथ एक ही मकान में ‘रहती’ हैं या ‘रह चुकी’ हैं।

कानून बनाने की प्रक्रिया के हर चरण में नागरिकों की आवाज बहुत मायने रखती है। यह आवाज टेलिविज़न रिपोर्टों, अखबारों के संपादकीयों, रेडियो प्रसारणों और आम सभाओं के जरिए सुनी और व्यक्त की जा सकती है।

अलोकप्रिय और विवादस्पद कानून

कई बार संसद एक ऐसा कानून पारित कर देती है जो बेहद अलोकप्रिय साबित होता है।

ऐसा कानून संवैधानिक रूप से वैध होने के कारण कानूनन सही हो सकता है। फिर भी वह लोगों को रास नहीं आता क्योंकि उन्हें लगता है कि उसके पीछे नियत सही नहीं थी।

हमारे जैसे लोकतंत्र में आम नागरिक संसद द्वारा बनाए जाने वाले दमनकारी कानूनों के बारे में अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं।

उदाहरण

नगरपालिका की सीमाओं के भीतर जगह के इस्तेमाल से संबंधित विभिन्न नगरपालिका कानूनों में पटरी पर दुकान लगाने और फेरी लगाने को गैरकानूनी घोषित किया गया है।

कानूनन सही होते हुए भी हम इस बात को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते कि पटरी वाले एवं फेरी वाले किसी भी बड़े शहर में रहने वाले लाखों लोगों को ज़रूरी चीजें और सेवाएँ बहुत सस्ती कीमत पर और कुशलतापूर्वक पहुँचाते हैं। इसी से उनकी रोज़ी-रोटी भी चलती है।

इस प्रकार अगर कानून किसी एक समूह की हिमायत करता है और दूसरे समूह की उपेक्षा करता है तो उस पर विवाद खड़ा होगा और टकराव की स्थिति पैदा हो जाएगी।

जो लोग सोचते हैं कि संबंधित कानून सही नहीं है, वे इस मुद्दे पर फैसले के लिए अदालत की शरण में जा सकते हैं।

अन्य महत्त्वपूर्ण बातें –

  • भारतीय लोगों के विरोध के बाद भी 10 मार्च, 1919 को रोलेट एक्ट लागू किया गया। इस कानून के जरिए ब्रिटिश सरकार बिना मुकदमा चलाए लोगों को कारावास में डाल सकती थी। पंजाब में इस कानून का भारी पैमाने पर विरोध होता रहा।
  • इसी क्रम में 10 अप्रैल को डॉ.सत्यपाल और डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। इन नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा का आयोजन किया गया।
  • जिस समय यह सभा चल रही थी उसी समय जनरल डायर ब्रिटिश फौजी टुकड़ियों के साथ बाग में दाखिल हुआ। उसने बाहर निकलने का रास्ता बंद करके बिना चेतावनी दिए लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं।
  • इस हत्याकांड में कई सौ लोग मारे गए और असंख्य जख्मी हुए।

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