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हिंदी संत काव्य

हिंदी संत काव्य

सामान्यतः सदाचार के लक्षणों से युक्त व्यक्ति को संत कहा जाता है। डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने संत का संबंध ‘शांत’ से माना है और इसका अर्थ –निवृति मार्गी या वैरागी बताया है। वर्तमान में हिंदी साहित्य में निर्गुणोपासक ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियों को संत कहा जाता है।

संत काव्य का दार्शनिक आधार है शंकराचार्य एवं उपनिषदों द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन, नाथ पंथ, सूफी धर्म एवं इस्लाम। उपनिषदों में निरुपित ब्रह्म, जीव, जगत एवं माया के स्वरूप को संत कवियों ने ज्यों का त्यों ग्रहण किया।

संतों का साधना पक्ष और भक्ति भावना शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन की देन है।

दोनों ही जीव को विशुद्ध ब्रह्म मानते हैं तथा जो भिन्नता दिखाई पड़ती है वह माया के कारण है।

हिंदी संत काव्य में नाथपंथियों से शून्यवाद, योगसाधना, गुरु की प्रतिष्ठा का तत्व लिया।

इस्लाम के प्रभाव से उन्होंने एकेश्वरवाद ग्रहण किया, मूर्तिपूजा का खंडन किया और अवतारवाद का विरोध किया।

सूफियों से उन्होंने प्रेमभाव ग्रहण किया और दाम्पत्य प्रतीकों का प्रयोग भक्ति भावना की अभिव्यक्ति हेतु किया। रामानंद ने भक्ति का द्वार शूद्रों एवं निम्न वर्गों के लिए खोल दिया था।

प्रमुख संत कवि और उनकी रचनाएं

कबीर-

हिंदी संत काव्य में कबीर का महत्वपूर्ण स्थान है इनका जन्म 1398 ई. हुआ। ये जाति से जुलाहे थे, काशी में रहते थे। इनकी पत्नी का नाम लोई, पुत्र का नाम कमाल एवं पुत्री का नाम कमाली था। इनके गुरु का रामानंद था। इनकी रचनाओं का संकलन धर्मदास द्वारा बीजक नाम से किया गया। जिसके तीन भाग हैं- साखी, सबद, रमैनी। कबीर निरक्षर थे। 

बीजक के अलावा बाबू श्यामसुंदर दास ने उनकी रचनाओं का संकलन कबीर ग्रंथावली में किया है। उनकी कविता में अनुभूति की सच्चाई एवं अभिव्यक्ति का खरापन है। समाज में व्याप्त रूढ़ियों, अंधविश्वासों, पाखंड का उन्होंने खंडन किया।

उन्होंने मूर्तिपूजा, माला, तिलक, छापा, तीर्थाटन, गंगास्नान, रोजा, हिंसा, जाति प्रथा, ऊँच-नीच की भावना आदि का खंडन किया। वे शास्र पर नहीं बल्कि आँखों देखी बात पर विश्वास करते थे।

कबीर का प्रतिपाद्य दो प्रकार का है- रचनात्मक एवं आलोचनात्मक। गुरु की महत्ता पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया है।

कबीर ने जीव को ब्रह्म का अंश माना है जो माया के कारण अपने स्वरूप को भुला हुआ है। माया के नष्ट होते ही जीवात्मा एवं परमात्मा का मिलन हो जाता है। इन्होंने गुरु महिमा का पाठ नाथ पंथियों से सीखा है। इनका रहस्यवाद भावात्मक कोटि का भी है।

जहाँ जीवात्मा उस निर्गुण परमात्मा से भावात्मक सम्बन्ध जोड़ती हुई विरह, मिलन, जिज्ञासा की अनुभूति करती है। इनकी भाषा को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा है। कबीर को कहीं भी अभिव्यक्ति के लिए भाषा का संकट नहीं झेलना पड़ा।

आचार्य हजारीप्रसाद ने उन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा है। काव्य में प्रतीकों का भी भरपूर प्रयोग किया है। उनकी उलटबंसियां सिध्दों से प्रभावित है।

रामानंद-

इनका जन्म 1368 ई. तथा मृत्यु 1468 ई. में हुई। ये कान्यकुंज ब्राह्मण थे और शिक्षा काशी में हुई। भक्तमाल ग्रन्थ के अनुसार इनके बारह थे, जिनके नाम हैं- अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानन्द, भावानंद, पीपा, कबीर, सेन, धना, रैदास, सुरसुरी और पद्मावती।

रामानंद के गुरु का नाम राघवानंद। इन्होंने रामावत-सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया। तीर्थ यात्रा, मूर्तिपूजा, वेदादि का विरोध करते हुए उन्होंने अन्तः साधना पर बल दिया।

रैदास(1398-1448)-

ये जाति से चमार थे, काशी के निवासी थे। कुछ विद्वान इन्हें प्रसिद्ध कवयित्री मीरा का गुरु भी बताते है। रैदास का एक अन्य नाम रविदास भी है। इनकी रचनाओं का संकलन ‘रविदास की बानी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।

इनके लिखे हुए 40 पद गुरु ग्रन्थ साहब में भी संकलित हैं।

उनकी भाषा सरल ब्रजभाषा है जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली, उर्दू-फारसी के शब्द भी मिल जाते हैं।

गुरु नानक(1469-1538)-

सिख सम्प्रदाय के प्रवर्तक गुरु नानक का जन्म 1469 ई. में तलवंडी में हुआ जिसे अब ननकाना साहब के नाम से जाना जाता है।

उनके पिता नाम कालूचंद और माता का नाम तृप्ता था। इनके दो पुत्र भी हुए- लक्ष्मीचंद और श्रीचंद।

नानक के पद गुरु ग्रन्थ साहब में संकलित हैं। जपुजी, असा दीवार, रहिरास, सोहिला उनकी रचनाओं के नाम है। शांत रस की प्रधानता नानक की रचनाओं में है। उनकी भाषा पंजाबी एवं ब्रजभाषा मिश्रित है।

उनके पद राग-रागिनियों में निबद्ध हैं जिनमें करुण, शांत एवं श्रृंगार रस भी दिखाई पड़ता है।

हरिदास निरंजनी-

ये निरंजनी सम्प्रदाय के कवि थे। इस सम्प्रदाय को नाथ पंथ और संत काव्य के बीच की कड़ी माना गया है। इनके लिखे ग्रन्थ हैं- अष्टपदी, जोगग्रंथ, ब्रह्मस्तुती, हंसप्रबोध ग्रन्थ, निरपखमूल ग्रन्थ, पूजायोग ग्रन्थ, समाधिजोग ग्रन्थ, संग्रामजोग ग्रन्थ।

इनका काव्य ब्रजभाषा में लिखा गया है।

दादूदयाल(1544-1603)-

इन्होंने दादू पंथ(परमब्रह्म सम्प्रदाय) का प्रवर्तन किया। ये एक धर्म सुधारक वम समाज सुधारक के रूप में प्रसिद्ध रहस्यवादी कवि थे। इनके प्रमुख शिष्य रज्जब, सुन्दरदास, प्रागदास, जनगोपाल थे।

उनकी रचनाओं का संकलन ‘हरडेवाणी’ नाम से उनके शिष्यों- संतदास एवं जगन्नाथ दास ने प्रस्तुत किया है।

मलूकदास(1574-1682)-

इनके लिखे प्रमुख ग्रन्थ- ज्ञानबोध, रतनखान, भक्तिविवेक, सुखसागर, भक्तवच्छावली, बारहखड़ी, स्फुटपद, राम अवतार लीला, ब्रजलीला तथा ध्रुवचरित

आलसियों का महामंत्र इन्हीं का रचा हुआ है-

अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम। दस मलूका कह गए सबके दाता राम।

सुन्दरदास(1596-1689)-

ये दादूदयाल के शिष्य थे और प्रतिभाशाली कवि थे। इनके लिखे ग्रंथों में ज्ञानसमुद्र और सुन्दरविलास प्रसिद्ध हैं। इनकी रचनाओं का संकलन सुन्दर ग्रंथावली (दो भाग) में पुरोहित हरिनारायण शर्मा ने किया है।

सुन्दरदास शृंगार रस के परम विरोधी थे। केशव की रसिकप्रिया और नन्ददास की रसमंजरी की निंदा उन्होंने अपने एक छंद में की है।

इनकी रचनाएँ ब्रजभाषा में हैं।

लालदास (1540-1648)- लाल पंथ के प्रवर्तक।

बाबालाल (1590-1655)- बाबालाली सम्प्रदाय के प्रवर्तक।

संत रज्जब (1567-1689)

बाबरी साहिबा (1542-1605)- बाबरी पंथ की प्रवर्तक।

शेख फरीद (1472-1552)- ये पंजाब के संत कवियों में उल्लेखनीय हैं। आदि ग्रन्थ में इनके चार पद संकलित हैं।

संत सदना, संत पीपा, संत सेन, संत धन्ना भी संत कवियों में गिने जाते हैं। पंजाब में सिक्ख गुरुओं ने भी संत काव्य की रचना की है। इनमें प्रमुख है- गुरु अंगद, गुरु अमरदास, गुरु रामदास और गुरु अर्जुन देव। अंगद ने नानक की रचनाओं का संकलन किया और ब्रजभाषा मिश्रित पंजाबी में सरस गेय पदों की रचना की। गुरु अर्जुन देव भी एक अच्छे कवि थे। इनके 6000 पद गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है। उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं- सुखमनी, बावनअखरी और बारहमासा

हिंदी संत काव्य की प्रमुख विशेषताएँ

  • संत काव्य भाव प्रधान है, कला प्रधान नहीं।
  • कविता करना इनका लक्ष्य नहीं था। काव्य तो इनके उपदेशों का साधन मात्र था।
  • ये कवी निर्गुणोपासक थे। वे ईश्वर को निर्गुण, निराकार, अजन्मा, अविनाशी एवं सर्वव्यापी मानते हैं।
  • कभी-कभी वे इस निर्गुण को राम, गोविन्द, हरि आदि नामों से भी पुकारते हैं।
  • इस काव्य में ज्ञान की महत्ता को प्रतिपादित किया गया है।
  • यह ज्ञान वेद-पुराणों या कुरान से नहीं, बल्कि चित्त की निर्मलता एवं ह्रदय की पावनता से प्राप्त किया जाता है।
  • संत काव्य में गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए उसे ईश्वर से भी बड़ा बताया गया है।
  • इस काव्य में अद्वैतवादी दर्शन को स्थान मिला है। संत काव्य में रहस्यवाद की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है।
  • इन कवियों ने बाह्याडम्बरों का खंडन किया।
  • ये जाति प्रथा के विरोधी थे। ऊँच-नीच, छुआछूत एवं वर्णाश्रम व्यवस्था को अभिशाप मानकर इन्होंने निर्भीकता से इनका खंडन किया।
  • हिंदी संत काव्य में कवियों का नारी विषयक दृष्टिकोण असंतुलित एवं अतिवादी है।
  • वे नारी को नरक का द्वार एवं माया का प्रतिरूप बताते हैं।
  • नारी निंदा करते हुए वे उसे विष की बेल तक कह देते हैं।
  • इनकी भाषा अपरिष्कृत है। साहित्यिक भाषा की जगह बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है।
  • आभूषणों का उपयोग चमत्कार करने के लिए नहीं, बल्कि भावना के अमृत के लिए किया जाता है।
  • उनकी शायरी में शांत रस की प्रधानता है।
  • कबीर के अकशेरुकी जीवों में भी अद्भुत रस है।

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