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रूसी क्रांति (1917 ई.)

रूसी क्रांति (1917 ई.)

रूसी क्रांति (1917 ई.)

बीसवीं सदी के विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक रूस की राज्य क्रांति (1917 ई.) है। शताब्दियों से रूसी इतिहास भ्रष्ट, अत्याचारी, निरंकुश, जारशाही के उत्पीड़न और शोषण का इतिहास रहा है।

क्रांति के लिए उत्तरदायी परिस्थियाँ –

1. निरंकुश शासन वर्ग –

जार शासक स्वेच्छाचारी शासन एवं दैवी अधिकार के सिद्धांत में विश्वास रखते थे और उसी आधार पर शासन चलाना चाहते थे। इस निरंकुश, कठोर एवं दमनकारी शासन में जन सहयोग एवं उनकी भावनाओं को कोई स्थान प्राप्त नहीं था।

जार के पास ड्यूमा के अधिवेशन बुलाने, स्थगित करने या भंग करने के अधिकार में मंत्रीगण उसी के प्रति उत्तरदायी थे। ऊपरी सदन नामक संस्था का भी ड्यूमा पर नियंत्रण था।

उधर जनता के प्रबुद्ध नेता सुधारों की मांग करने लगे जहाँ की जनता भी स्वयं अपने राजनीतिक अधिकारों से परिचित हो गई थी।

इसीलिए वे अब यह चाहते थे कि रूस में जारशाही का अंत हो और जनतंत्रीय शासन प्रणाली की स्थापना हो।

2. कृषक वर्ग का असन्तोष –

कृषकों की अवस्था अत्यन्त दयनीय थी जिसके कारण कृषि गंभीर संकटों में फंसी रहती थी। 1861 ई. में कृषि दासों की मुक्ति की व्यवस्था की गई थी जिसके अपशेषों को गाँवो से मिटाया नहीं जा सका।

जमीदारों को दिए जाने वाले करों के कारण कृषकों की गरीबी निम्नतर स्तर को पार कर गई थी।

स्टोलिपिन ने कृषि क्षेत्र में सुधारों की योजना बनाई जिसके कारण किसानों को गाँव छोड़ने एवं जमीन पर निजी स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हो गए।

इन कानूनों से कृषकों को कुछ लाभ तो मिला लेकिन भूमिहीन कृषकों की समस्या का समाधान नहीं हो सका।

3. औद्योगिक एवं श्रमिक असन्तोष –

जार अलेक्जेंडर प्रथम के शासनकाल में रूस में तीव्र गति से औद्योगिक विकास हुआ। विभिन्न उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होने लगी।

औद्योगिक विकास ने आर्थिक सम्पन्नता के स्थान पर आर्थिक असंतोष को बढ़ावा दिया। भारी उद्योगों की संख्या में वृद्धि होने के साथ-साथ उनकी उत्पादन क्षमता कम होने लगी।

समाजवादी दलों के प्रभाव से श्रमिक आन्दोलन का स्वरूप अब मूलतः राजनीतिक हो गया था वे चाहते थे कि जारशाही की निरंकुशता एवं पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए एवं उसके स्थान पर सर्वहारा वर्ग का शासन लागू किया जाए।

4. गैर-रूसी जातियों का विरोध –

जारशाही शासक किसी प्रान्त या सूबे में षड्यंत्रकारी ताकतों के साथ बड़ी निर्दयता का बरताव करती थी। 1863 ई. में पौलेण्ड के विद्रोह का निर्ममता से दमन करने से वहां की जनता आतंकित हो गई थी जिसके फलस्वरूप वहां समाजवादी विचारधारा एवं राष्ट्रीयता की भावना का विकास होने लगा।

19वीं सदी के अंत में मध्य एशिया में खिरगीज व उजबेग जातियों ने जारों की निरंकुशता के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। जार्जिया, पौलेण्ड एवं बाल्टिक प्रान्तों में 1905 ई. में बड़े पैमाने पर विद्रोह हुए।

5. समाजवादी विचारधारा एवं बोल्शेविक दल –

जिस प्रकार फ्रांस में राज्य क्रांति का वातावरण तैयार करने एवं जनता में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता पैदा करने का श्रेय मुख्य रूप से वहां के बुद्धिजीवी वर्ग को जाता है।

1860 ई. के बाद समाजवादी विचारधारा का प्रचार एक आन्दोलन के रूप में शुरू किया। हजैन व जर्नीशेवेर इस आन्दोलन के प्रणेता थे। इस आन्दोलन के समर्थकों को ‘पोपुलिस्ट’ कहा जाता था।

वे इस बात के पक्षपाती थे कि कृषकों को भू-स्वामी मान लिया जाए एवं ग्राम सभाओं के माध्यम से भूमि का वितरण हो।

6. प्रथम विश्व युद्ध में उत्पन्न परिस्थितियां –

1914 ई. में प्रथम महायुद्ध में रूस की भागीदारी को बोल्शेविको ने नापसंद किया। जनता सरकार की इस कार्यवाही के खिलाफ थी। क्योंकि वह जारशाही का पतन चाहती थी। रूस के युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार नहीं था।

युद्ध से राज्य की आर्थिक अवस्था बिगड़ती गई। कृषकों को सेना में झोंक देना हानिकारक था। कृषकों को सेना में भर्ती करने के कारण कृषि उत्पादन में बहुत कमी आई। ऐसे माहौल में मजदूरों एवं कृषकों का असंतोष बढ़ना स्वाभाविक था।

जार निकोल द्वितीय अयोग्य एवं अदूरदर्शी था। वह इयमा का का अंत करने एवं प्रतिक्रियावादी नीति के समर्थकों के दमन में लगा रहा।

क्रांति का सूत्रपात –

रूसी क्रांति का तत्कालीन कारण पेट्रोग्राड में 8 मार्च, 1917 ई. को हुई मजदूरों की हड़ताल थी। वे अत्याचारी शासन का नाश हो, के नारे बुलन्द कर रहे थे। in उपद्रवकारियों का दमन करने हेतु जार ने सेना भेजी जिसने ऐसा करने से मना कर दिया।

मजदूरों एवं विद्रोही सैनिकों ने मिलकर ‘सैनिकों एवं मजदूरों के प्रतिनिधियों की क्रान्तिकारी सोवियत’ बनाई जिसने शासन के वास्तविक अधिकार हस्तगत कर लिए।

14 मार्च को सोवियत व ड्यूमा के सदस्यों ने मिलकर ‘अस्थाई सरकार’ प्रिन्स ल्वाव के नेतृत्त्व में गठित की। जिसने जार को सिंहासन छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया। इस प्रकार एक ही झटके में रोमानोववंश धराशाही हो गया।

‘अस्थाई सरकार’ को सर्वसाधारण वर्ग का समर्थन नहीं था। इसलिए उसने स्थिति सुदृढ़ करने के जनता को धर्म, भाषा, प्रेस एवं सभा की स्वतंत्रता देने के साथ-साथ राजनीतिक बन्दियों को भी मुक्त कर दिया।

अस्थाई सरकार जनता की तीन मांगो-  शांति, जमीन और रोटी को पूर्ण करने में असमर्थ थी। जिसके कारण लोगों में असंतोष बढ़ता गया।

8 नवम्बर, 1917 ई. को लेनिन की अध्यक्षता में नई सरकार का प्रथम मंत्रिमंडल बनाया गया जिसमें ट्राटस्की, स्टलिन, राइकॉव इत्यादि को शामिल किया गया।

केन्द्रीय शक्तियों से संधि करना, राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक अवस्था में परिवर्तन लाना, ऐसी व्यवस्था कारण जिससे सर्वहारा वर्ग का अधिनायकतंत्र उस समय तक स्थाई रहे जब तक देश की सम्पूर्ण जनता साम्यवादी शासन में भाग लेने योग्य ने हो जाए।

ब्रेस्ट लिटावेस्क की संधि एवं रूस का युद्ध से अलग होना –

बोल्शेविक दल ने सत्ता ग्रहण करने के बाद युद्धरत राष्ट्र के साथ पृथक-पृथक संधि करने का निर्णय लिया। दिसम्बर, 1917 में रूस से संधिवार्ता की एवं 3मार्च, 1918 को जर्मनी एवं उसके साथी सभी राज्यों के साथ संधि करके युद्ध का अंत कर देने का निर्णय लेकर बोल्शेविक नेताओं ने रूसी इतिहास में महत्वपूर्ण कार्य किया।

‘ब्रेस्ट लिटावेस्क संधि’ की शर्तों के आधार पर रूस को 5000 हजार वर्ग मील का क्षेत्र एवं करीब 330 लाख लोगों पर से अपना अधिकार छोड़ना पड़ा।

बोल्शेविक शासन के विरोधी –

बोल्शेविक शासन की स्थापना तो बड़ी सुगमता से हो गई थी लेकिन विरोधियों की कमी नहीं थी।

नवम्बर 1917 से 1920 के शुरू तक लगभग तीन वर्ष तक बोल्शेविक को अपने तीन मुख्य विरोधियों का सामना करना पड़ा जिनमें रोमानेव वंश के समर्थक, लोकतंत्र वादी, जो फ्रांस अमेरिका के समान प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था चाहते थे एवं तीसरे वे लोग थे जो हालांकि साम्यवादी विचारधारा के समर्थक थे।

लेकिन वे क्रान्तिकारी उपायों से समाज के आर्थिक संगठन को एकदम बदल देना मुनासिब नहीं समझते थे।

विरोधियों का सामना करते हुए रूसियों को बंदी जार एवं उसके परिजनों का ध्यान आया उन्होंने पेट्रोग्राड को असुरक्षित मानकर उन्हें यूराल प्रदेश भेज दिया लेकिन जब विरोधी सेनाएँ वहां पर भी पहुँचने लगी तो क्रांतिकारियों ने 16 जुलाई, 1918 को जार एवं जरीना को गोली से उदा दिया।

‘लाल सेना’ की बढ़ती हुई शक्ति देखकर मित्र राष्ट्रों ने रूस में सक्रीय हस्तक्षेप नीति बदल दी और उन्होंने वहां पर युद्धरत अपनी सेनाओं को वापिस बुला लिया।

1921 ई. तक न केवल रूस में आतंरिक शांति स्थापित हो गई, बल्कि फ्रांस, पौलेण्ड एवं अन्य देशों ने यह भली भांति महसूस कर लिया कि बोल्शेविकों की शक्ति को कुचलना असम्भव है।

नवीन सरकार का स्वरूप –

नवम्बर 1917 ई. की क्रांति से रूस में जिस बोल्शेविक सरकार की स्थापना हुई थी रूसी क्रांति स्वरूप एवं संगठन संसार के इतिहास में बिल्कुल नया था।

अपनी स्थापना के चौथे दिन बोल्शेविक सरकार ने एक आज्ञाप्ति जारी करके आठ घंटे का कार्यदिवस निर्धारित कर दिया एवं मजदूरों व कर्मचारियों के निःशुल्क राज्य बेरोजगारी तथा स्वास्थ्य बीमा प्रणाली भी लागू की गई।

15 नवम्बर को सोवियत सरकार ने रूसी जनता के अधिकारों का घोषणा पत्र प्रकाशित किया जिसमें जातीय उत्पीड़न का अंत, सभी जातियों की समानता, सर्वसत्ता, आत्मनिर्णय का अधिकार एवं सभी जातीय व धार्मिक विशेषाधिकारों व प्रतिबंधों के उन्मूलन की उद्घोषणा की गई थी।

इसी घोषणा पत्र का अमल करते हुए दिसम्बर 1917 में सरकार ने फिनलैंड की स्वतंत्रता को मान्यता प्रदान कर दी।

अप्रैल, 1918 में रूस का नवीन संविधान निर्मित करने हेतु एक आयोग गठित किया गया जिनके सदस्य स्टालिन, बुखारिन, सवर्दलाव, पोक्रवास्की आदि थे। आयोग तीन जुलाई को संविधान तैयार करके ‘सेन्ट्रल कमेंटी’ के समक्ष प्रस्तुत किया।

सरकार ने जमीदारों एवं बड़े-भूपतियों की जमीन को राज्य की भूमि घोषित करके उन्हें कृषकों में वितरित कर दी।

बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीकरण किया गया। निजी व्यापार एवं आयात प्रतिबन्ध कर दिया। इसके साथ ही बैकिंग व्यवस्था एवं विदेशी व्यापार पर भी नियंत्रण स्थापित कर दिया।

बोल्शेविक सरकार ने राष्ट्रीय झण्डे का रंग लाल नियत किया और उस पर दर्राती (किसानों का चिह्न) एवं हथौड़ा (मजदूरों का चिह्न) अंकित किया गया।

राष्ट्रीय चिह्न में यह भी अंकित किया गया कि ‘रूसी सोशिलिस्ट सोवियत फेडरल रिपब्लिक’, “संसार के श्रमिकों मिलकर एक हो जाओं।”

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