हिंदी में रामकाव्य
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हिंदी में रामकाव्य की शुरुआत भक्तिकाल में हुई मानी जाती है। लेकिन उपलब्ध प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत भाषा में लिखित ‘रामायण’ ही रामकथा का मूल स्रोत है। इसके रचना काल के बारे में विद्वान एकमत नहीं है, किन्तु इतना निश्चित है कि इसकी रचना गौतम बुध्द के जन्म से पहले हो चुकी थी क्योंकि इसमें बुद्धावतार का उल्लेख नहीं है।
बौद्ध जातक कथाओं में रामकथा दशरथ जातक और अनामर्क जातक में मिलती है। जैन साहित्य में रामकथा पर आधारित अनेक ग्रन्थ मिलते हैं जिनमें प्रमुख निम्न प्रकार है-
| क्र.सं. | रचना का नाम | रचयिता का नाम |
| 1. | पउमचरियम | विमल सूरी |
| 2. | सियाचरियम | भुवनतुंग सूरी |
| 3. | रामचरियम | भुवनतुंग सूरी |
| 4. | उत्तर पुराण | गुणभद्र |
| 5. | कथाकोष मर रामायण कथानकम तथा सीता कथानकम | हरिषेण |
| 6. | पउम चरिउ | स्वयंभू |
| 7. | महापुराण | पुष्पदंत |
दक्षिण के आलवार भक्तों में रामभक्ति पाई जाती है। आलवार भक्तों की संख्या बारह मानी जाती है। इनमें से ‘शठकोरप’ अथवा नक्मालवार को ‘राम की पादुका’ का अवतार माना जाता है। इनके द्वारा रचित ‘तिरुवायमोली’ ग्रन्थ में अनन्य रामभक्ति का वर्णन
रामभक्ति के सम्प्रदाय
| सम्प्रदाय | आचार्य | विशेष |
| श्री सम्प्रदाय | रंगनाथ मुनि, पुण्डरीकाक्ष, राम मिश्र, यमुनाचार्य, रामानुजाचार्य | 1. प्रबंधन में आलवार भक्तों के पदों का संकलन 2. रामानुजाचार्य को शेषनाग अथवा लक्ष्मण का अवतार माना जाता है। 3. इन्होंने द्वैतवाद का प्रचार किया। |
| ब्रह्म सम्प्रदाय | मध्वाचार्य |
उत्तर भारत में रामभक्ति का प्रवर्तन आचार्य रामानुज की परम्परा में राघवानन्द द्वारा हुआ। इन्हीं राघवानन्द के शिष्य रामानन्द थे। उन्होंने धनुषबाणधारी राम के लोकरक्षक रूप की उपासना प्रारम्भ कर हिन्दू समाज की पराजित मनोवृत्ति का शमन किया और जबरन मुसलमान बनाये गए हिन्दुओं को ‘रामतारक मंत्र’ देकर हिन्दू धर्म में पुनः लौटने का मार्ग खोल दिया। इनके शिष्यों में निर्गुणोपासक दोनों थे।
संस्कृत भाषा में रामकथा ग्रन्थ
| क्र.सं. | रचना | रचयिता | विशेष टिप्पणी |
| 1. | प्रतिमा नाटक | भास | राम वनगमन से रावण वध तक की कथा |
| 2. | अभिषेक नाटक | भास | बालि वध से राम राज्याभिषेक तक की कथा |
| 3. | रघुवंश | कालिदास | 10वें से 15वें सर्ग तक रामकथा |
| 4. | रावण वध | प्रवरसेन | राम-रावण युद्ध का वर्णन |
| 5. | महाविरचरित | भवभूति | राम के विवाह से लेकर अभिषेक तक की कथा |
| 6. | उत्तररामचरित | भवभूति | सीता वनवास की कथा |
| 7. | उदात्त राघव | अंनगहर्ष | वनवास से अयोध्या वापस आने तक की कथा |
| 8. | जानकी हरण | कुमारदास | रामायण के प्रथम छह कांडों की कथा |
| 9. | रामायण मंजरी | क्षेमेन्द्र | वाल्मीकि रामायण की संक्षिप्त कथा |
| 10. | दशावतारचरितम | क्षेमेन्द्र | रामकथा के चरित्रों में नवीनता |
| 11. | कुन्दमाला | दिड्नाग | भवभूति के उत्तररामचरित से प्रभावित कथा |
| 12. | उदार राघव | साकल्यमल | |
| 13. | रघुनाथ चरित | वायन भट्टणवाण | |
| 14. | अनंघ राघव | मुरारि | |
| 15. | बाल रामायण | राजशेखर | |
| 16. | आश्चर्य चूड़ामणि | शक्तिप्रद | |
| 17. | प्रसन्नराघव | जयदेव | |
| 18. | उल्लास राघव | सोमेश्वर | |
| 19. | राघव पाण्डवीय | धनंजय | रामकथा के साथ पाण्डवों की कथा |
| 20. | राघव नैषधीय | हरिदत्त सूरी | श्लेष-यमकपरक रचना |
| 21. | राघव पाण्डव-यादवीय | चिदम्बर | श्लेष-यमकपरक रचना |
हिंदी में रामकाव्य के प्रमुख ग्रन्थ
| क्र.सं. | रचना | रचयिता |
| 1. | रामरक्षा स्तोत्र | रामानन्द |
| 2. | वाल्मीकि रामायण का हिंदी अनुवाद | विष्णुदास |
| 3. | भरतमिलाप, अंगद पैज | ईश्वरदास |
| 4. | हनुमान चरित | सुन्दरदास |
| 5. | रावण-मन्दोदरी संवाद | मुनि लावण्य |
| 6. | रामचरित या रामरास, हनुमन्त दास | ब्रह्मजिनदास |
| 7. | हनुवन्तगामी कथा | ब्रह्मरायणमल्ल |
| 8. | हनुमानजी की आरती | रामानन्द |
| 9. | ध्यानमंजरी, अष्टयाम, रामभजन मंजरी, उपासना वावनी, पदावली, हितोपदेश भाषा | अग्रदास |
| 10. | रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, रामाज्ञा प्रश्नावली, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी | गोस्वामी तुलसीदास |
| 11. | रामचंद्रिका | केशवदास |
| 12. | कवित्त रत्नाकर | सेनापति |
| 13. | रामायण महानाटक | प्राणचंद चौहान |
| 14. | रामरासो, अध्यात्म रामायण | माधवदास चारण |
| 15. | हनुमन्नाटक | ह्रदयराम |
| 16. | पौरुषेय रामायण | नरहरि वापट |
| 17. | अवध विलास | लालदास |
| 18. | रघुनाथ चरित, दशावतार चरित | परशुराम |
| 19. | रघुनाथ चरित | माधवदास जगन्नाथी |
| 20. | रामायण | कपूरचंद त्रिखा |
| 20. | साकेत | मैथिलीशरण गुप्त |
आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा
| क्र.सं. | रचना | रचयिता | भाषा |
| 1. | कृत्तिवासी रामायण | कृत्तिवास | बंगला |
| 2. | कम्ब रामायण | कम्ब | तमिल |
| 3. | रंग रामायण | रंग | तेलुगू |
| 4. | भास्कर रामायण | भास्कर | तेलुगू |
| 5. | भावार्थ रामायण | एकनाथ | मराठी |
| 6. | रामायण, अर्द्ध रामायण, मंगल रामायण, सुन्दर रामायण, संकेत रामायण | गिरिधर स्वामी | मराठी |
| 7. | पद रामायण | माधव कन्दली | असमिया |
| 8. | गीति रामायण | शंकरदेव | असमिया |
| 9. | कथा रामायण | माधवदेव | असमिया |
| 10. | कीर्तनिया रामायण | अनन्त कन्दली | असमिया |
| 11. | गुजराती रामायण | कवि मालण | गुजराती |
हिंदी में रामकाव्य परम्परा के भक्तकवि
स्वामी रामानन्द (1400-1470 ई.)-
इनका समय (1400-1470 ई.) के बीच माना जा सकता है। इनका जन्म कशी में हुआ तथा राघवानन्द से इन्होंने दीक्षा ली थी। इनके बारह शिष्यों का उल्लेख भक्तमाल में मिलता है जिनमें से प्रमुख थे- कबीर, रैदास, धना, पीपा आदि। स्वामी रामानन्द ने रामावत सम्प्रदायका प्रवर्तन किया। इनके लिखे दो संस्कृत ग्रन्थ ‘वैष्णव मताब्ज भास्कर’ और ‘श्रीरामार्चन पद्धति’ अति प्रसिद्ध हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत है कि रामानन्द वर्णाश्रम के विरोधी नहीं थे, किन्तु उपासना के क्षेत्र में, भगवत भक्ति के क्षेत्र में वे किसी भेदभाव को स्वीकार नहीं करते थे। उपासना एवं भक्ति का द्वार उन्होंने सब के वर्णों एवं जातियों के लिए खोल दिया। रामानंद सम्प्रदाय की गद्दी गलताजी (राजस्थान) में अनंतानंद के शिष्य कृष्णदास पयहारी ने स्थापित की। इसे उत्तर तोताद्री भी कहा जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास –
इनका जन्म (मुलगोसांई चरित व तुलसी चरित के अनुसार) 1554 विक्रमी माना जाता है और मृत्यु संवत् 1680 विक्रमी में। ऐसा मानने पर तुलसी की आयु 126 वर्ष ठहरती हैजो सम्भव नहीं जान पड़ती। अतः पंडित रामगुलाम द्विवेदी और जार्ज ग्रियर्सन का मत अधिक स्वीकार्य है जिसके अनुसार तुलसी का जन्म संवत् 1589 विक्रमी अर्थात् 1532 ई. में हुआ था और मृत्यु 1680 वि. अर्थात् 1623 ई. में हुई। तुलसी के जन्मस्थान एटा जिले के ‘सोरो’ नामक स्थान को मानते हैं। आचार्य शुक्ल के अनुसार यह ‘सुकर खेत’ एटा जिले का सोरों कस्बा नहीं है अपितु गोंडा जिले में सरजू किनारे स्थित एक पवित्र तीर्थ ‘सुकर क्षेत्र’ है।
तुलसी की रचनाओं की संख्या आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने बारह मानी है जिसमें पांच बड़े और सात छोटे ग्रन्थ हैं- 1. रामचरितमानस, 2. विनयपत्रिका, 3. कवित्त रामायण (कवितावली), 4. दोहावली, 5. गीतावली, 6. रामलला नहछू, 7. कृष्णगीतावली, 8. वैराग्य संदीपनी, 9. रामाज्ञा प्रश्नावली, 10. बरवै रामायण, 11. पार्वती मंगल, 12. जानकी मंगल।
उनके कुछ ग्रंथों की रचना की रचना के सम्बन्ध में जनश्रुतियां प्रचलित हैं। यथा-
बरवै रामायण-
की रचना गोस्वामी तुलसीदास ने अपने मित्र अब्दुर्रहमान खानखाना (रहीम) के आग्रह पर की थी। इसमें प्रयुक्त छंद वही हैं जो रहीम के ग्रन्थ बरवै नायिका भेद में हैं।
कृष्ण गीतावली-
की रचना वृंदावन यात्रा के अवसर पर तुलसी ने की। गोसांई चरित में बेनीमाधवदास ने लिखा है कि कृष्ण गीतावली और राम गीतावली की रचना तुलसी ने चित्रकूट में उसके बाद लिखे गए जब सूरदास जी उनसे मिलने चित्रकूट आए थे।
रामाज्ञा प्रश्न-
इसकी रचना तुलसी ने अपने मित्र प्रसिद्ध ज्योतिषी पंडित गंगाराम के अनुरोध पर की थी जो काशी में प्रह्लाद घाट पर रहते थे।
कहा जाता है कि हनुमान बाहुक की रचना तुलसी ने बाहु पीड़ा से मुक्ति पाने हेतु की थी।
विनयपत्रिका नामक अर्जी की रचना तुलसी ने ‘कलिकाल’ से मुक्ति पाने हेतु राम के दरबार में प्रस्तुत करने हेतु की।
हिंदी में रामकाव्य की प्रमुख प्रवृत्तियां
राम का स्वरूप-
रामकाव्य परम्परा के कवियों ने भगवान् विष्णु के अवतार ‘राम’ के जीवन-चरित्र को आधार बनाकर अपने काव्य-ग्रंथों की रचना की। तुलसी ने राम के जिस स्वरूप की परिकल्पना रामचरितमानस में की है, वह शक्ति, शील एवं सौन्दर्य का भण्डार हैं। इनके राम लोक रक्षक हैं साथ ही अपूर्व शील से सबके ह्रदय को अपने वशीभूत कर लेते हैं।
भक्ति का स्वरूप-
राम भक्ति शाखा के कवियों ने राम के प्रति दास्य-भाव की भक्ति-भावना प्रदर्शित की है। वे स्वयं को सेवक तथा ‘राम’ को अपना आराध्य मानते हैं। तुलसी की भक्ति नवधा भक्ति है जिसका चरम उत्कर्ष विनय पत्रिका में देखा जा सकता है।
समन्वयवादी प्रवृत्ति-
राम भक्त कवियों की एक उल्लेखनीय विशेषता है- इनकी समन्वयवादी प्रवृत्ति। तुलसी के समय में समाज में अनेक प्रकार के विग्रह व्याप्त थे। धर्म, जाति, सम्प्रदाय, भाषा के नाम पर आए दिन संघर्ष होते रहते थे, अतः समन्वय तत्कालीन युग की आवश्यकता थी।
मूल्य बोध एवं युगबोध-
राम भक्त कवियों का उद्देश्य केवल काव्य रचना करना ही नहीं था। वे जितने उच्चकोटि के कवि थे, उतने ही बड़े उपदेशक भी थे। उनकी रचनाएं केवल काव्य रसिकों के आस्वाद की विषय-वस्तु नहीं हैं, अपितु जनता के एक बहुत बड़े वर्ग को जीवन के नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी देती हैं।
नारी विषयक दृष्टिकोण-
हिंदी में रामकाव्य के कवियों ने स्थान-स्थान पर नारी के विषय में अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। प्रायः आलोचकों ने तुलसी के नारी विषयक दृष्टिकोण के प्रति पूर्वाग्रह रखते हुए उन्हें नारी निन्दक के रूप में निरुपित किया है।
प्रबंध रचना की प्रवृत्ति-
भक्तिकाल के राम भक्त कवियों ने राम कथा को लेकर प्रायः प्रबन्ध काव्यों की रचना की है। तुलसी का रामचरितमानस इस काव्य परम्परा का अन्यतम महाकाव्य है। इसके अतिरिक्त प्राणचंद चौहान ने रामायण महानाटक, लालचंद ने अवध विलास और हृदयराम ने हनुमन्नाटक नामक प्रबन्ध काव्य परम्परालिखे हैं।
विविध काव्य शैलियां-
रामभक्त कवि शास्रज्ञ एवं विद्वान थे। वे कविता करने में सिद्धहस्त थे, अतः किसी एक विशेष शैली में ही नहीं अपितु विविध काव्य शैलियों में पारंगत थे। यही कारण है कि राम काव्य की रचना विविध शैलियों में की तुलसी ने रामचरितमानस की रचना प्रबन्ध काव्य के रूप में दोहा-चौपाई शैली में की, जबकि कवितावली की रचना कवित्त-सवैया शैली में मुक्तक काव्य के रूप में की। विनयपत्रिका में पद शैली को तथा बरवै रामायण में बरवै शैली को अपनाया गया है।
रामकाव्य में रस-योजना-
राम काव्य का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसमें सभी रसों की योजना करने का अवसर कवियों को प्राप्त हो गया है, परिणामतः इस काव्य में नव रसों का पूर्ण परिपाक उपलब्ध होता है। भक्ति भावना की प्रधानता होने के कारण निर्वेद जन्य शान्त रस को ही हम राम काव्य का प्रधान रस स्वीकार कर सकते हैं।
अवधी भाषा का प्रयोग-
राम काव्य की रचना प्रमुख रूप से अवधी भाषा में हुई है। गोस्वामी जी का रामचरितमानस अवधी भाषा में लिखा गया है। उन्होंने कवितावली एवं विनय पत्रिका जैसे मुक्तक काव्यों में सुन्दर, मधुर, सरस ब्रजभाषा का प्रयोग करते हुए अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय दियाहै। तुलसी के अतिरिक्त अन्य भक्तिकालीन कवियों ने प्रायः अवधी में ही राम काव्य की रचना की है।
छंद एवं अलंकार योजना-
राम भक्त कवि काव्य मर्मज्ञ थे। वे काव्यशास्त्र के नियमों से बंधी हुई छन्द-योजना करने में पूर्ण समर्थ थे। यही कारण है कि तुलसी जैसे समर्थ कवि ने किसी एक छन्द में नहीं अपितु विविध छन्दों में काव्य रचना की है। रामचरितमानस में दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया आदि छंदों का सफल प्रयोग हुआ है।
हिंदी में रामकाव्य परम्परा के कवि अलंकार प्रवीण थे। काव्य में अलंकारों के प्रयोग में ये सिद्धहस्त थे। यद्यपि इन्होंने चमत्कार प्रदर्शन के लिए अलंकार योजना नहीं की है तथापि उनका काव्य अलंकारों से मण्डित है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा उनके प्रिय अलंकार हैं।
