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हिंदी सूफी काव्य

हिंदी सूफी काव्य

हिंदी सूफी काव्य

सूफी मत का वैचारिक आधार-

  • भक्तिकाल की निर्गुण धारा के अंतर्गत हिंदी संत काव्य एवं हिंदी सूफी काव्य नामक दो शाखाएँ है। हिंदी सूफी काव्य के अन्य नाम है- प्रेममार्गी शाखा, प्रेमाश्रयी शाखा, प्रेमाख्यानक काव्य परंपरा, रोमांचित कथा काव्य परंपरा आदि। इसमें प्रेमतत्व की प्रधानता परिलक्षित होती है।
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन प्रेमाख्यानकों पर फारसी मसनवियों का प्रभाव माना है, किन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस प्रकार का प्रेम चित्रण भारतीय परंपरा में भी प्रचुरता से उपलब्ध होता है।
  • प्राकृत भाषा में गुनाढ़य द्वारा रचित वृहत्कथा तथा क्षेमेन्द्र के कथासरित्सागर की प्रेमकथाओं में प्रेम की उत्पति सौन्दर्य प्रेरणा से हुई है। नायक को नायिका के संरक्षकों का विरोध झेलना पड़ा है।
  • फारसी मसनवियों में नायिका का विवाह प्रतिनायक से हो जाता है और नायक आत्महत्या कर लेता है पर भारतीय प्रेमाख्यानकों में किसी देवी शक्ति की सहायता से नायक को नायिका की प्राप्ति अवश्य ही हो जाती है।
  • वस्तुतः यह प्रेमाख्यानक परंपरा महाभारत की अनेक कथाओं में उपलब्ध होती है। महाभारत का नल-दमयंती वृतांत (वन पर्व) प्रेमाख्यानक काव्य की सभी विशेषताओं से युक्त है और डॉ. नगेन्द्र ने इसी को भारतीय प्रेमाख्यानों की आधारभूमि माना है।

सूफी शब्द की व्युत्पत्ति

  • मुसलमानों के पवित्र स्थान मदीना की मस्जिद के सामने वाले चबूतरे का नाम सुफ्फा चबूतरा है। इस प्रकार बैठने वाले फकीरों को सूफी कहा जाता है।
  • कुछ विद्वानों ने इसका सम्बन्ध सोफिया शब्द से जोड़ा है जिसका अर्थ है- ज्ञान।
  • एक अन्य मत में इस शब्द का विकास सफा से माना है- जिसका अर्थ है- शुध्द एवं पवित्र।
  • सबसे ज्यादा मान्य मत यह है कि सूफी शब्द का सम्बन्ध सूफ से है जिसका अर्थ है- ऊन। सूफी लोग सफेद ऊन से बने हुए चोगे पहनते थे और उनका आचरण पवित्र एवं शुद्ध होता था।

सूफी मत के स्रोत-

  • सूफी मत इस्लाम धर्म का एक अंग है। इस्लाम धर्म में शरियत (कर्मकाण्ड) की प्रतिक्रिया का वैसा ही परिणाम सूफी मत है जैसे हिन्दू धर्म में वैदिक कर्मकाण्ड की प्रतिक्रिया का परिणाम वैष्णव मत है।
  • इस मत के मूल में प्रेम तत्व है। उसमें इश्क हकीकी एवं इश्क मजाजी की भावना निहित है।
  • सूफियों ने लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम को प्राप्त करने पर बल दिया।
  • सूफीमत का आदि स्रोत हमें शामी जातियों की आदिम प्रवृति में मिलता है। शमियों से मूर्ति चुम्बन की परिपाटी सूफियों में बोस एवं वस्ल के रूप में प्रचलित हुई। पिरपरस्ती एवं समाधी पूजा की भाव भी सूफियों ने शमी से लिया।

सूफी धर्म का भारत में प्रचारप्रसार

  • भारत में सूफी मत के प्रचार-प्रसार का श्रेय ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती को है, जिन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया। आइने अकबरी में सूफियों के 14 सम्प्रदायों का उल्लेख है, जिनमें से पांच सम्प्रदाय प्रसिद्ध हैं- 1. कादरी सम्प्रदाय, 2. चिश्ती सम्प्रदाय, 3. सुहरावर्दी सम्प्रदाय, 4. नक्शबंदी सम्प्रदाय एवं  5. शत्तारी सम्प्रदाय।
  • इनमें से चिश्ती सम्प्रदाय सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ। इसकी सातवीं पीढ़ी में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती हुए, जिन्होंने भारत में सूफी मत का प्रचार-प्रचार किया।
  • सुहरावर्दी सम्प्रदाय का भारत में प्रचार बहाउद्दीन जकरिया ने किया।
  • कादरी सम्प्रदाय का प्रवर्तन भारत में अब्दुल कादिर ने किया। इस सम्प्रदाय के सैयद मोहम्मद गौस इतने ख्याति प्राप्त हुए कि सिकंदर लोदी ने अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दिया।
  • नक्शबंदी सम्प्रदाय का प्रचार भारत में 17वीं शती में अहमद फारुखी ने किया।

सूफी मत की मान्यताएं-

  • सूफी मत में ईश्वर को सर्वव्यापी एवं निराकार माना है। वे ईश्वर को जगत में व्याप्त मानकर उनके सौन्दर्य पर मुग्ध होते हैं।
  • इनके अनुसार मानव सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और उसमें ईश्वर की छाया है।
  • शैतान साधक के मार्ग में बाधक है, किन्तु यह साधक की साधना को परिपक्व बनाता है। यह शैतान वेदांत की माया के समान है।
  • सूफी साधना के सात सोपान हैं- 1. अनुपात, 2. आत्मसंयम, 3. वैराग्य, 4. दारिद्रय, 5. धैर्य, 6. विश्वास, 7. प्रेम।
  • ईश्वर साधना के चार पड़ाव हैं- 1. शरियत, 2. तरीकत, 3. मारिफत, 4. हकीकत। इन पड़ावों से गुजरकर ही वह हाल की दशा में पहुंचता है।
  • सूफियों में मजार पूज्य है एवं तीर्थयात्रा की भी मान्यता है।
  • ये साधक की कल्पना पति रूप में तथा ईश्वर की कल्पना पत्नी रूप में करते है।

सूफी काव्य की प्रवृत्तियां-

  1. मुसलमान कवि एवं मसनवी शैली- हिंदी सूफी काव्य के अधिकांश कवि मुसलमान हैं, लेकिन उनमें धार्मिक कट्टरता का अभाव है। इन्होंने चरित काव्यों को सूफियों की मसनवी शैली में प्रस्तुत किया। मसनवी शैली के अंतर्गत वे प्रथम ईश्वर वंदना (हम्द) तत्पश्चात हजरत मुहम्मद की स्तुति (नअत), तदुपरान्त मुहम्मद साहब के चार मित्रों की प्रशंसा (मंकबत) और फिर शाहे वक्त (तत्कालीन शासक) की प्रशंसा (मदह) की जाती है।
  2. प्रेमगाथाओं का नामकरण- सूफी कवियों ने प्रेमगाथाओं का नामकरण प्रायः नायिका के आधार पर किया है। कुछ ऐसी रचनाएँ भी हैं जिनमें नायिका के नाम के साथ कथा शब्द जोड़कर नाम रखा गया है, जैसे- सत्यवती कथा। इन काव्य ग्रंथों में नायिका को ईश्वरीय जलाल (ज्योति) और जमाल (सौन्दर्य) से मंडित दिखाया गया है।
  3. अलौकिक प्रेम की व्यंजना- प्रेमगाथा काव्य परंपरा के अधिकांश कवियों ने लौकिक प्रेमकथाओं के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना की है। राजा रत्नसेन एवं पद्मावती के जिस प्रेम का उल्लेख ‘पद्मावत’ में किया गया है वह इसी प्रकार का है। अलौकिक प्रेम की इस व्यंजना के कारण सूफी कवियों की रचनाओं में रहस्यवाद का समावेश हो गया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूफी कवियों के काव्य में पाई जाने वाली रहस्यवादी प्रवृति को भावात्मक कोटि का रहस्यवाद रहस्यवाद स्वीकार किया है- “यदि कहीं सच्चे भावात्मक रहस्यवाद के दर्शन होते हैं, तो जायसी आदि सूफी कवियों में।”
  4. कथा-संगठन एवं कथानक रूढ़िया- सूफी कवियों के प्रेमाख्यानक प्रबंध-काव्य हैं, जिनमें कथा तत्व का समावेश है। इन प्रबंध काव्यों के कथा स्रोत भारतीय पुराण, इतिहास एवं अन्य लोक प्रचलित प्रेम कहानियां हैं। वस्तु वर्णन की प्रधानता होने के कारण कथा-प्रवाह में व्याघात पड़ा है तथा कहीं-कहीं नीरसता भी आ गई है। इन कवियों ने अपनी रचनाओं में भारतीय एवं ईरानी काव्य-रूढ़ियों का समावेश भी किया है।
  5. चरित्र-चित्रण- सूफी प्रेमाख्यानकों में नायक-नायिकाओं के चरित्रांकन की एक जैसी पध्दति दिखाई पड़ती है। उनमें जीवन के विविध घात-प्रतिघातों का अभाव है। प्रेम पथ की कठिनाइयों का चित्रण करते हुए नायक के चरित्र को उभारने का प्रयास किया गया है।
  6. लोकपक्ष एवं हिन्दू संस्कृति का चित्रण- सूफी कवियों ने अपनी रचनाओं में लोक जीवन का पर्याप्त चित्रण किया है। हिंदी सूफी काव्य की रचना करने वाले कवि हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की सामान्य जानकारी रखते थे अतः प्रसंगानुसार इन्होंने अपने पौराणिक ज्ञान, ज्योतिष, आयुर्वेद की जानकारी का उपयोग अपने काव्य ग्रंथों में किया है।
  7. भाव एवं रस व्यंजना- सूफी कवियों का मूल प्रतिपाद्य है- प्रेम, अतः इनकी रचनाओं में श्रृंगार रस की प्रधानता रही है। सौन्दर्य निरूपण के अंतर्गत नायिका के नख-शिख, रूप-रंग, हाव-भाव का चित्रण करने के साथ-साथ उसकी विद्वता, बुध्दिमत्ता एवं कला विशारदता का उल्लेख भी किया है। श्रृंगार रस के अतिरिक्त अन्य रसों की योजना भी इन काव्य ग्रंथों में की गई है।
  8. वस्तु वर्णन- सूफी काव्य ग्रंथों में वस्तु वर्णन की प्रधानता दिखाई देती है। इन कवियों के वास्तु वर्णन पर टिप्पणी करते हुए डॉ. सरला शुक्ल ने लिखा है- “कहीं-कहीं वस्तु वर्णन इतना विस्तृत है कि उससे कवियों के वस्तु ज्ञान के प्रदर्शन के अतिरिक्त कौतुहल, आकर्षक या प्रभावशीलता में किंचित भी वृद्धि नहीं हो पाती।“ सूफी कवियों के द्वारा अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में किया गया है। यह वस्तु वर्णन उनके काव्य का एक दुर्बल पक्ष ही माना जाएगा।
  9. खंडन-मंडन का आभाव- सूफी कवियों ने किसी विशेष समुदाय का खंडन-मंडन नहीं किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूफी कवियों की इस विशेषता को स्पष्ट करते हुए लिखा है- “प्रेम स्वरूप ईश्वर को सामने लाकर सूफी कवियों ने हिन्दू और मुसलमान दोनों को मनुष्य के सामान्य  रूप में दिखाया और भेदभाव के दृश्यों को हटाकर पीछे कर किया।
  10. काव्य रूप- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूफी प्रेम गाथाओं को फारसी की मसनवी शैली में रचित ग्रंथो के अंतर्गत माना है। उनके अनुसार ईश वंदना, शाहे वक्त का उल्लेख, कथा का सर्गों में विभक्त न होना तथा सम्पूर्ण ग्रन्थ में एक ही छंद का प्रयोग आदि ऐसी विशेषताएं है जिनके कारण इन्हें मसनवी रचनाएँ कहा जाना उपयुक्त है। जबकि कुछ अन्य विद्वानों ने उनके मत को अस्वीकार किया है।
  11. भाषा एवं अलंकार योजना- सूफी कवियों ने अपनी रचनाओं में अवधी भाषा का प्रयोग किया है। जायसी ने पद्मावत में जिस अवधी का प्रयोग किया है, वह ठेठ ग्रामीण अवधी है, अतः उसमे वैसी साहित्यिकता एवं संस्कृत निष्ठता दिखाई नहीं देती जो तुलसी की भाषा में विद्यमान है। सूफी कवियों ने अलंकारों की योजना भी अपनी रचनाओं में की है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अतिशयोक्ति अलंकारों का प्रयोग इन कवियों ने प्रायः सौन्दर्य वर्णनों में किया है।

प्रसिद्ध सूफी कवि एवं उनकी रचनाएं

क्र.सं. रचना रचयिता रचना वर्ष नायक नायिका भाषा
1. हंसावली असाइत 1370 ई. राजकुमार हंसावली राजस्थानी
2. चंदायन मुल्ला दाऊद 1379 ई. लोर (लोरिका) चंदा अवधी
3. लखमसेन-पद्मावती कथा दामोदर कवि 1459 ई. लक्ष्मण सेन पद्मावती राजस्थानी
4. ढ़ोला मारू रा दूहा कुशललाभ 1473 ई. राजकुमार ढ़ोला मारवनी राजस्थानी
5. सत्यवती कथा ईश्वरदास 1501 ई. ऋतू पर्ण सत्यवती अवधी
6. मृगावती कुतुबन 1503 ई. राजकुमार मृगावती अवधी
7. माधवानल-कामकंदला गणपति 1527 ई. माधव कामकंदला राजस्थानी
8. पद्मावत जायसी 1540 ई. रत्नसेन पद्मावती अवधी
9. मधुमालती मंझन 1545 ई. मनोहर मधुमालती अवधी
10. माधवानल-कामकंदला चौपाई कुशललाभ 1556 ई. माधव कामकंदला राजस्थानी
11. रूपमंजरी नन्ददास 1568 ई. कृष्ण रूप मंजरी ब्रजभाषा
12. माधवानल-कामकंदला आलम 1584 ई. माधव कामकंदला अवधी
13. छिताई वार्ता नारायणदास 1590 ई. राजकुमार छिताई ब्रजभाषा
14. चित्रावली उसमान 1613 ई. सुजान चित्रावली अवधी
15. रसरतन पुहकर 1618 ई. सोम रम्भा अवधी
16. ज्ञानदीप शेखनवी 1619 ई. ज्ञानदीप देवयानी अवधी
17. हंसजवाहिर कासिमशाह राजा हंस रानी जवाहिर अवधी
18. अनुराग बांसुरी नूर मुहम्मद 1764 ई. अवधी
19. इंद्रावती नूर मुहम्मद 1744 ई. राजकुंवर इंद्रावती अवधी
20. कथा रूप मंजरी जान कवि ब्रजभाषा

This Post Has One Comment

  1. भारती बिष्ट

    आपने काफी बढिया उल्लेख किया है
    मुझे इस परम्परा में जो पड़ाव है उनका क्रम ज्ञात करना था यदि सम्भव हो तो बताये

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