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राजस्थान में कृषि

राजस्थान में कृषि

राजस्थान में कृषि

राजस्थान में कृषि मानसून-रूपी जुए पर आधारित है। यहाँ देश का 11 प्रतिशत भाग कृषि योग्य भूमि है और राज्य में 50 प्रतिशत सकल सिंचित क्षेत्र है। जबकि 30 प्रतिशत शुद्ध सिंचित क्षेत्र है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 2/3 भाग खरीफ की फसल में बोया जाता है। राज्य में कृषि जोतो का औसत आकार 3.96 हैक्टेयर है।

भारत में हरित क्रांति का प्रारंभ 1966-67 में एम.एस. स्वामीनाथन के प्रयासों से हुआ। विश्व में हरित क्रांति के जनक नॉर्मन बोरलोग हैं। राज्य में हरित क्रांति के तहत सर्वाधिक उत्पादन वृद्धि खाद्यान्न (गेंहू) के क्षेत्र में हुआ है।

राज्य में कृषि के भाग – 1. रबी, 2. खरीफ व 3. जायद

क्र.सं. फसल व उपनाम बुआई कटाई प्रमुख फसलें
1. खरीब (स्यालू/सावनु) जून-जुलाई अक्टूबर-नवम्बर बाजरा, ज्वार, मूंगफली, कपास, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, चावल
2. रबी (उनालू) अक्टूबर-नवम्बर मार्च-अप्रेल गेहूं, जौ, चना, सरसों, मसूर, मटर, अलसी, तारामीरा, सूरजमुखी
3. जायद मार्च-अप्रेल मई-जून तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, कासनी

फसलों के प्रारूप-

खाद्यान्न नगदी/व्यापारिक
गेहूं, ज्वार, जौ, मक्का, बाजरा, चावल, दालें- मूंग, मोठ, अरहर, उड़द, मसूर, चंवला गन्ना, कपास, तम्बाकू, तिलहन- सरसों, राई, तारामीरा, अरंडी, मूंगफली, तिल, सोयाबीन

खाद्यान्न फसलें

1. गेहूं

राजस्थान में सर्वाधिक खाया जाने वाला और सर्वाधिक उत्पादित होने वाला खाद्यान्न गेहूं है। देश में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर-प्रदेश में होता है। राजस्थान का गेहूं उत्पादन में देश में चौथा स्थान है। राजस्थान का पूर्वी भाग गेहूं उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। जबकि श्रीगंगानगर जिला राज्य में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला जिला है। गेहूं के अधिक उत्पादन के कारण गंगानगर को राज्य का अन्न भंण्डार (अन्न का कटोरा) कहा जाता है। इसकी बुआई के समय तापमान कम से कम 8˚ से 10˚ सें. तक होना चाहिए।

गेहूं के लिए नाइट्रोजन युक्त दोमट मिट्टी, महीन कांप मिट्टी व चीका प्रधान मिट्टी और मिट्टी का pH मान 5 से 7.5 के मध्य होना चाहिए। राजस्थान में गेहूं की प्रमुख किस्में सोना-कल्याण, सोनेरा, शरबती, कोहिनूर, दुर्गापुरा-65, गंगा सुनहरी, मंगला, चम्बल-65 और मैक्सिन बोयी जाती है। इसमें होने वाले प्रमुख रोग- छाछ्या, करजवा, रतुआ आदि है। गेहूं, मक्का और सोयाबीन के मिश्रण का आटा इण्डिया मिक्स और गेहूं, जौ और चना का मिश्रित आटा गौचणी कहलाता है।

2.जौ

देश में जौ का सर्वाधिक उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। उसके पश्चात् राजस्थान जौ उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राजस्थान के पूर्वी क्षेत्र में जौ सर्वाधिक होता है और राज्य में जौ उत्पादक प्रमुख जिलें- जयपुर(प्रथम), अजमेर और दौसा है। राजस्थान में जौ की प्रमुख किस्मों में ज्योति, RS-6, राजकिरण, मोल्वा और आर.एस.-6 है। जौ का उपयोग रोटी बनाने, मधुमेह रोगी के उपचार, शराब व बियर बनाने, माल्ट उद्योग में होता है।

3.ज्वार

देश में सर्वाधिक ज्वार महाराष्ट्र में होता है। जबकि राजस्थान में देश में चौथा स्थान रखता है। राजस्थान में मध्य भाग में ज्वार का सर्वाधिक उत्पादन होता है। राजस्थान में ज्वार उत्पादन अजमेर (प्रथम), उदयपुर, भीलवाड़ा एवं भरतपुर जिलों में होता है। ज्वार की राज्य में प्रमुख किस्में  पी.वी.-96, राजस्थान चरी-1 एवं चरी-2 है। ज्वार के लिए दोमट अथवा गहरी या मध्यम काली मिट्टी उपयोगी रहती है।

राजस्थान में ज्वार अनुसंधान केन्द्र वल्लभनगर, जिला उदयपुर में स्थापित किया गया है।

4.मक्का

मक्का मेवाड़ क्षेत्र का प्रमुख खाद्यान्न है। देश में सर्वाधिक मक्का का उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है। जबकि राजस्थान का मक्का के उत्पादन मे देश में आठवां स्थान है। राजस्थान का चित्तौडगढ़ जिला मक्का उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में मक्के की प्रमुख किस्में माही कंचन, माही धवल, सविता, नवजोत, किरण, गंगा-2 एवं गंगा-76 बोई जाती है।

बाँसवाड़ा जिले के बोरवर गाँव में कृषि अनुसंधान केंद्र संचालित है। जहाँ मक्के की संयुक्त किस्में माही कंचन और माही धवल विकसित की गई है। मक्का के दानों से मांडी (स्टार्च), ग्लूकोज तथा एल्कोहल तैयार की जाती है। मक्का की हरी पत्तियों से साइलेज चारा बनाया जाता है।

5.चावल

देश में सर्वाधिक मात्रा में उत्पादित होने वाला खाद्यान्न चावल है। देश में इसका सर्वाधिक उत्पादन पश्चिमी बंगाल में है। राजस्थान में चावल का उत्पादन बाँसवाड़ा, बूंदी एवं हनुमानगढ़  जिलों में होता है। राजस्थान में हुनमानगढ़ जिले के घग्घर नदी बहाव क्षेत्र (नाली बैल्ट) में “गरडा बासमती” नामक चावल का उत्पादन किया जाता है। जबकि कृषि अनुसंधान केन्द्र बासवांडा ने चावंल की माही सुगंधा किस्म विकसित की है। अन्य किस्में कावेरी, जया, परमल, चम्बल, गरडा बासमती, टी-29,सफेदा एवं लकड़ा बोई जाती है।

चावल के लिए कांपीय, दोमट, चिकनी मिटटी उपयोगी रहती है। चावल के लिए 20 से 27 डिग्री सेल्सियस तापमान व 125 से 200 से.मी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। जो कि राजस्थान में उपलब्ध नहीं है। अतः यहां जापानी पद्धति से चावन का उत्पादन किया जाता है। देश में प्रति हैक्टेयर अधिक उत्पादन में पंजाब राज्य का प्रथम स्थान रखता है। जबकि राज्य में प्रति हैक्टेयर उत्पादन सबसे अधिक हनुमानगढ़ जिले में होता है।

6. चना

यह एक उष्णकटिबधिय पौधा है। इसके लिए हल्की बलुई मिट्टी की आवश्यकता होती है। देश में उत्तर-प्रदेश के पश्चात् राजस्थान चना उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। राजस्थान में चुरू, बीकानेर, सीकर, हनुमानगढ़ जिलों में चने का उत्पादन होता है। गेहूं और जौ के साथ चने को बोने पर उसे गोचनी या बेझड़ कहा जाता है। राजस्थान में कुल दलहनी फसलों में चने का उत्पादन सर्वाधिक होता है। राज्य में राष्ट्रिय औसत से चने का उत्पादन प्रति हैक्टेयर अधिक होता है, जबकि अन्य लगभग सभी फसलों का राष्ट्रिय औसत से उत्पादन कम होता है।

7.दलहन

चने के पश्चात् विभिन्न प्रकार की दालों में मोठ का स्थान आता है। मोठ के उत्पादन में राजस्थान का भारत में प्रथम स्थान है। दलहनी फसलों में सर्वाधिक सुखा सहन करने वाली फसल मोठ है। राजस्थान का पश्चिमी भाग दालों में अग्रणी स्थान रखता है। राजस्थान का नागौर जिला दालों के उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में कुल कृषि भूमि का 18 प्रतिशत दाले बोयी जाती है। उड्द की दाल भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में सहायक है। पौधों को नाइट्रोजन नाइट्रेट के रूप में प्राप्त होती है। जबकि राइजोबियम नामक बैक्टीरिया नाइट्रोजन को नाइट्रेट के रूप में परिवर्तित करता है।

8.बाजरा

बाजरा का जन्म स्थान अफ्रीका को माना जाता है। देश में सर्वाधिक बाजरे का उत्पादन राजस्थान में होता है। राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र में बोई जाने वाली फसल बाजरा है। राजस्थान का पश्चिमी भाग बाजरा उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है। राजस्थान में बाजरा उत्पादन क्षेत्र बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, जयपुर, करौली आदि जिलों में हैं। राजस्थान में बाजरे की साधारण किस्म के अतिरिक्त Raj-171 प्रमुख किस्म है। राजस्थान के पूर्वी भाग में संकर बाजरा होता है। उसे सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है। राजस्थान में बाजरा अनुसंधान केन्द्र बाडमेर में स्थित है। बाजरे में लगाने वाले प्रमुख रोग जोगिया, ग्रीन ईयर, सुखा रोग, कंडुआ आदि है। बाजरे की फसल के अरकट (गोंद) लगने से यह जहरीला हो जाता है जो उल्टी-दस्त और गर्भपात का कारण बन जाता है। अरकट एक जहरीली (टोक्सिन) फफूंद है। स्वाद में मीठी एस फफूंद से प्रसव के लिए दवा और इंजेक्शन बनाये जाते हैं।

नगदी/व्यापारिक फसले

9.गन्ना

गन्ना भारतीय मूल का पौधा है। दक्षिणी भारत में सर्वप्रथम गन्ने की खेती आरम्भ हुई। वर्तमान में विश्व में गन्ने का सर्वाधिक उत्पादन भारत में ही होता है। भारत में उत्तर प्रदेश राज्य गन्ना उत्पादन में प्रथम स्थान पर है (देश का 40 प्रतिशत)। राजस्थान में प्रमुख गन्ना उत्पादन क्षेत्र बूंदी(प्रथम), गंगानगर, उदयपुर एवं हनुमानगढ़ जिलों में हैं। गन्ने में लगने वाले प्रमुख रोग लाल सडन रोग, पाइरिला, कंडवा, रेडक्रास रोग हैं।

10.कपास

यह भारतीय मूल का पौधा है। इसका विकास सिन्धुघाटी सभ्यता में हुआ। कपास के उत्पादन में भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। वर्तमान में राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला कपास उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है। इसके लिए नमी युक्त चिकनी मिट्टी या काली मिट्टी उपयोगी रहती है। कपास को “बणीया” या “सफेद सोना” कहा जाता है। कपास से बिनौला निकाला जाता है उससे खल बनाई जाती है। कपास की एक गांठ 170 किलो की होती है। श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में अमेरिकन कपासनरमा किस्म की कपास प्रचलित है। मालवी कपास कोटा, बूंदी, झालावाड़ जिलों में बोई जाती है। कपास की फसल में अधिक ठंड में “बालवीविल कीड़ा” लग जाता है। इसकी रोग प्रतिरोधक साधक फसल भिण्डी होती है।

11.तम्बाकू

पूर्तगाली 1508 ईं. में इसको भारत लेकर आये थे। मुगल शासक जहांगीर ने सर्वप्रथम भारत में 1608 ई. में इसकी खेती की शुरूआत की किन्तु कुछ समय पश्चात् इसके जब दुष्परिणाम आने लगे तब जहांगीर ने ही इसे बंद करवा दिया। वर्तमान में भारत का आंधप्रदेश राज्य तम्बाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में पूर्व भाग में तम्बाकू का सर्वाधिक उत्पादन होता है। अलवर जिला तम्बाकू उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में तम्बाकू की दो किस्में (अ) निकोटिना टेबुकम व  (ब) निकोटिना रास्टिका बोयी जाती है।

12.तिलहन (तिलहन विकास कार्यक्रम 1984-85)

सरसो, राई, तारामीरा, तिल, मूंगफली, अरण्डी, सोयाबीन, होहोबा राजस्थान में उत्पन्न होने वाली प्रमुख तिलहन फसलें है। तिलहन उत्पादन में राजस्थान का तीसरा स्थान है। तिलहन उत्पादन में उत्तर प्रदेश प्रथम है। किन्तु सरसों व राई के उत्पादन में राजस्थान प्रथम स्थान रखता है।

सरसों

राजस्थान का भरतपुर जिला सरसों के उत्पादन में राज्य में प्रथम स्थान पर है। केन्द्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र सेवर, जिला भरतपुर की स्थापना 1983 में की गयी। सरसों के हल्की चिकनी या दोमट मिट्टी उपयोगी रहती है। इसकी प्रमुख किस्में वरुणा, आर.एच.-819, पूसा बोल्ड आदि है। सरसों में लगने वाले प्रमुख रोग चेंपा (मस्टर्ड एफिड), तना गलन रोग, सफेद रौली तथा आल्टरनेरिया झुलसा हैं। पीत क्रांति (पीली क्रांति) प्रमुख रूप से सरसों की क्रांति है। राजस्थान को सरसों का प्रदेश  कहा जाता है। तिलहन की रबी फसलों में सरसों का क्षेत्रफल सर्वाधिक है। सरसों के तेल निकालने के बाद बचने वाली लुगदी खळ कहलाती है। राज्य की सबसे बड़ी सरसों मंडी सुमेरपुर, जिला पाली में स्थित है।

मूंगफली

विश्व में मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत में होता है। भारत में गुजरात राज्य मूंगफली उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। राज्य का जयपुर जिला मूंगफली के उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है। बीकानेर जिले का लूणकरणसर क्षेत्र उत्तम मूंगफली के लिए प्रसिद्ध है अतः उसे राजस्थान का राजकोट कहा जाता है। मूंगफली में लगने वाले प्रमुख रोग टिक्कारोग, क्राउनरोट, कालरा, भूंग, सफेद लट आदि हैं।

तिल, सोयाबीन अरण्डी

राज्य में तिल पाली जिले में, अरण्डी जालौर जिले में, सोयाबीन झालावाड़ में उत्पन्न होती है। सोयाबीन राजस्थान राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग (हडौती) में होती है। इसमें सर्वाधिक प्रोटीन होती है। भारत में सर्वाधिक सोयाबीन मध्यप्रदेश में होता है।

होहोबा (जोजोबा)

इसे भारत में इजराइल से मगाया गया। इसका जन्म स्थान एरिजोना का मरूस्थल है। राजस्थान में सर्वप्रथम यह पौधा 1965 में काजरी इजरायल से लाया गया। राजस्थान में इसकी कृषि उन क्षेत्रों में की जाती है जहां सिचाई के साधनों का अभाव पाया जाता है। होहोबा को पीला सोना भी कहा जाता है। इसके तेल का उपयोग सौन्दर्य प्रसाधनों, भारी मशीनरियों व हवाई जहाजों में लुब्रिकेण्टस के रूप में किया जाता है। राजस्थान में होहोबा के तीन फार्म है –

  1. ढण्ड (जयपुर)
  2. फतेहपुर (सीकर) सहकारी
  3. झज्जर, (बीकानेर) निजी

रतनजोत– सिरोही, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाडा

अफीम– चित्तौडगढ़, कोटा, झालावाड

सोयाबीन – झालावाड़, कोटा, बांरा, बूंदी, चित्तौड़गढ़

गवार– यह कपड़ा उद्योग, श्रृंगार, विस्फोटक सामग्री बनाने के काम में आता है। सबसे बड़ी गवार मंडी जोधपुर में है तथा गवार गम उद्योग भी जोधपुर में सर्वाधिक है।

ईसबगोल(घोड़ा जीरा) – बाड़मेर, सिरोही, नागौर, पाली तथा जोधपुर। भारत का लगभग 40 प्रतिशत ईसबगोल जालौर में उत्पादित होता है।

CAZRI (काजरी)

केन्द्रिय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केन्द्र (काजरी) की स्थापना 1959 में जोधपुर में की गई है। काजरी का प्रमुख कार्य मरूस्थलीय प्रसार को रोकना, वृक्षा रोपण को बढावा देना और मरूस्थलीय क्षेत्र की समस्याओं का निवारण करना है। इसके 5 उपकेन्द्र – बीकानेर, जैसलमेर, पाली, भुज, लदाख।

नोट- 1998 में राजस्थान के सभी जिलों में काजरी संस्थान में ही विज्ञान सेवा केन्द्रो की स्थापना की गई।

महत्वपूर्ण उत्पादन क्रांतियाँ-

क्र.सं. क्रांति का नाम  
1. हरित क्रांति खाद्यान्न
2. श्वेत क्रांति दुग्ध
3. पीली क्रांति तिलहन(सरसों)
4. गुलाबी क्रांति झींगा
5. नीली क्रांति मत्स्य
6. काली (कृष्ण) क्रांति पेट्रोलियम(पेट्रोल, डीजल, केरोसिन)
7. लाल क्रांति टमाटर
8. भूरी क्रांति खाद्यान्न प्रसंस्करण
9. बादामी क्रांति मसाला उत्पादन
10. स्लेटी क्रांति सीमेंट
11. गोल क्रांति आलू
12. इन्द्रधनुष क्रांति सभी कृषि उत्पादन

मसाला उत्पादन

विश्व में मसाला उत्पादन में भारत प्रथम स्थान रखता है। भारत में राजस्थान मसाला उत्पादन में प्रथम है। किन्तु गरम मसालों के लिए केरल राज्य प्रथम स्थान पर है। केरल को भारत का स्पाइस पार्क भी कहा जाता है। राज्य में दक्षिण-पूर्व का बांरा जिला राज्य में मसाला उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। राजस्थान का प्रथम मसाला पार्क -झालावाड़ में है।

केन्द्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान -दुर्गापुरा (जयपुर)

यांत्रिक कृषि फार्म-

1.सूरतगढ़ यांत्रिक कृषि फार्म – गंगानगर

क्षेत्रफल -12410 वर्ग हैक्टेयर

स्थापना– 15 अगस्त 1956

यह एशिया का सबसे बड़ा यांत्रिक कृषि फार्म है। इसकी स्थापना सोवियत संघ के सहयोग से की गई। इसका मुख्य कार्य कृषि क्षेत्र में यंत्रों को बढ़ावा देना, अच्छी नस्ल के पशुओं का कृषि कार्य में उपयोग करना है।

2.जैतसर यांत्रिक कृषि फार्म – श्रीगंगानगर

स्थापना -26 जनवरी 1962 (कनाडा)

क्षेत्रफल -12140 वर्ग हेक्टेयर

यह एशिया का दूसरा सबसे बडा यांत्रिक फार्म है।

राजस्थान में प्रथम निजी क्षेत्र की कृषि मण्डी कैथून (कोटा) में आस्ट्रेलिया की ए.डब्लू.पी. कंपनी द्वारा स्थापित की गई है।

पुष्प कृषि- राजस्थान में सर्वाधिक गुलाब का उत्पादन पुष्कर (अजमेर) में होता है। पुष्कर में राज्य की पहली पुष्प मंडी विकसित की गई है। यहाँ रोज इंडिया नामक गुलाब की विशिष्ट किस्म पाई जाती है। राजस्थान में चेती या दशमक गुलाब की खेती खमनौर (राजसमंद) में होती है। रिको द्वारा खुशखेडा, अलवर में पुष्प पार्क स्थापित किया जा रहा है।

श्वेत क्रांति

भारत में इसकी शुरूआत वर्गीज कुरियन द्वारा 1970 में की गई। इस क्रांति को “ऑपरेशन फ्लड” भी कहते है। डाॅ वर्गीज कुरियन अमूल डेयरी के संस्थापक भी है। जिसका मुख्यालय गुजरात को आनंद जिला है।

राज्य में संविदा खेती 11 जून 2004 में प्रारम्भ हुई

जालौर -समग्र मादक पदार्थो उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है।

कृषि के प्रकार-

  1. शुष्क कृषि
  2. सिंचित कृषि
  3. मिश्रित कृषि

1.शुष्क कृषि

ऐसी कृषि जो रेगिस्तानी भागों में जहां सिचाई का अभाव हो शुष्क कृषि की जाती है। इसमें भूमि में नमी का संरक्षण किया जात है।

(अ) फ्वारा पद्धति

(ब) ड्रिप सिस्टम

इजराइल के सहयोग से। शुष्क कृषि में इसका उपयोग किया जाता है।

2.सिचित कृषि

जहां सिचाई के साधन पूर्णतया उपलब्ध है। उन फसलों को बोया जाता है जिन्हें पानी की अधिक आवश्यकता होती है।

3.मिश्रित कृषि

जब कृषि के साथ-साथ पशुपालन भी किया जाता है तो उसे मिश्रित कृषि कहा जाता है।

मिश्रित खेती- जब दो या दो से अधिक फसले एक साथ बोई जाये तो उसे मिश्रित खेती कहते है।

झूमिग कृषि- इस प्रकार की कृषि में वृक्षों को जलाकर उसकी राख को खाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। राजस्थान में इस प्रकार की कृषि को वालरा कहा जाता है। भील जनजाति द्वारा पहाडी क्षेत्रों में इसे “चिमाता” व मैदानी क्षेत्रों में “दजिया” कहा जाता है। इस प्रकार की खेती से पर्यावरण को अत्यधिक नुकसान पहुंचता है। राजस्थान में उदयपुर, डूंगरपुर, बांरा में वालरा कृषि की जाती है।

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