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महाराणा कुम्भा

महाराणा कुम्भा

महाराणा कुम्भा

प्रारम्भिक जीवन –

महाराणा कुम्भा का जन्म 1403 ई. में हुआ था। उनकी माता परमारवंशीय राजकुमारी सौभाग्य देवी थी। अपने पिता मोकल की हत्या के बाद कुम्भा 1433 ई. में मेवाड़ के राजसिंहासन पर बैठा। तब मेवाड़ में प्रतिकूल परिस्थितियाँ थी, जिनका प्रभाव कुम्भा की विदेश नीति पर पड़ना स्वाभाविक था।

उन्होंने अपने पिता मोकल के हत्यारे चाचा व मेरा को राव रणमल राठौड़ की सहायता से मौत के घाट उतरवा दिया। राव रणमल के मेवाड़ के शासन पर बढ़ते हस्तक्षेप व प्रभुत्व से मेवाड़ के सरदारों में रणमल के विरुद्ध असंतोष बढ़ता जा रहा था।

अतः महाराणा कुम्भा ने इसके बाद अपने सरदारों के माध्यम से राव रणमल की 1438 ई. में हत्या करवा दी। इस प्रकार महाराणा कुम्भा ने शासन के 5 वर्ष की अवधि में ही चाचा, मेरा तथा रणमल के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याओं तथा मेवाड़ में राठौड़ों के प्रभुत्व को समाप्त कर अपने घरेलू बखेड़ों को समाप्त किया।

वह मेवाड़ से अलग हुए क्षेत्रों को पुनः अपने अधीन करना चाहता था। अतः उसने विजय-अभियान शुरू किया।

राजनीतिक उपलब्धियाँ –

बूँदी-विजय –

बूँदी के हाड़ा शासकों का मेवाड़ से तनावपूर्ण संबंध हो गया था। उस समय राव बैरिसाल वहाँ का शासक था। उसने मांडलगढ़ दुर्ग सहित ऊपरमाल के क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था।

अतः कुम्भा ने 1436 ई. में बूँदी के विरुद्ध सैनिक अभियान प्रारम्भ किया। जहाजपुर के पास दोनों ही सेनाओं में गंभीर युद्ध हुआ जिसमें बूँदी की हार हुई।

बूँदी ने मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ली। मांडलगढ़, बिजौलिया, जहाजपुर व पूर्वी-पठारी क्षेत्र भी मेवाड़-राज्य में मिला लिए गए।

सिरोही विजय –

सिरोही के शासक शेषमल ने मेवाड़ राज्य की सीमा के अनेक गाँवों पर अधिकार कर लिया था। अतः कुम्भा ने डोडिया नरसिंह के नेतृत्व में वहाँ सेना भेजी।

नरसिंह ने अचानक आक्रमण कर (1437 ई.) आबू तथा सिरोही राज्य के कई हिस्सों को जीत लिया। शेषमल ने आबू को पुनः जीतने के प्रयास में गुजरात के सुल्तान से भी सहायता ली परन्तु असफलता ही हाथ लगी।

मारवाड़ से सम्बन्ध –

मारवाड़ के रणमल का मेवाड़ में प्रभाव बढ़ता जा रहा था। कुम्भा ने इसे संतुलित करने के लिए मेवाड़ से गए हुए सामन्तों को पुनः मेवाड़ में आश्रय देना शुरू किया।

महपा पंवार और चाचा के पुत्र एक्का के अपराधों को भी क्षमा कर अपने यहाँ शरण दे दी। राघवदेव का बड़ा भाई चुणडा जो मालवा में था, वह भी मेवाड़ लौट आया।

कुम्भा ने धीरे-धीरे रणमल के विरुद्ध ऐसा व्यूह तैयार किया कि उसकी हत्या तक कर दी। रणमल की हत्या के समाचार फैलते ही उसका पुत्र जोधा अन्य राठौड़ों के साथ मारवाड़ की तरफ भागा।

तब चुणडा ने भागते हुए राठौड़ों पर आक्रमण किया। मेवाड़ की सेना ने मण्डोर पर अधिकार कर लिया लेकिन महाराणा की दादी हंसाबाई के बीच-बचाव करने के कारण जोधा इसको पुनः लेने में सफल हुआ।

वागड विजय –

कुम्भा ने डूंगरपुर पर भी आक्रमण किया और बिना कठिनाई के सफलता मिली। इसी भाँती वागड-प्रदेश की विजय से जावर मेवाड़ राज्य में मिला लिया गया।

मेरों का दमन –

मेरों के विद्रोह को दबाने में भी वह सफल रहा। बदनोर के आस-पास ही मेरो की बड़ी बस्ती थी। ये लोग सदैव विद्रोह करते रहते थे। कुम्भा ने इनके विद्रोह का दमन कर विद्रोही नेताओं को कड़ा दण्ड दिया।

पूर्वी राजस्थान का संघर्ष –

यह भाग मुसलमानों की शक्ति का केन्द्र बनता जा रहा था। बयाना व मेवात में इनका राज्य बहुत पहले से ही हो चुका था। रणथम्भौर की पराजय के बाद चौहानों के हाथ से भी यह क्षेत्र जाता रहा।

इस क्षेत्र को प्राप्त करने के लिए कछावा और मुस्लिम शासकों के अतिरिक्त मेवाड़ और मालवा के शासक भी प्रयत्नशील थे। फरिश्ता के अनुसार कुम्भा ने इस क्षेत्र पर आक्रमण करके रणथम्भौर पर अधिकार कर लिया था।

कुम्भा की प्रसारवादी नीति के कारण मालवा-गुजरात से संघर्ष अवश्यंभावी थे। मालवा के लिए एक शक्तिशाली मेवाड़ सबसे बड़ा खतरा था।

मेवाड़-मालवा संघर्ष का मूल कारण दिल्ली सल्तनत की कमजोरी थी फलतः प्रांतीय शक्तियों को अपनी-अपनी स्वतंत्र सत्ता का विकास करने की चिन्ता थी।

दूसरा कारण मालवा के उत्तराधिकारी संघर्ष में कुम्भा का सक्रिय भाग लेना था।

तीसरा कारण मेवाड़ के विद्रोही सामन्तों को मालवा में शरण देना था। कुम्भा द्वारा इन्हें लौटने की माँग को सुल्तान ने अस्वीकार कर दिया था।

इसलिए दोनों राज्यों के बीच सम्बन्ध तनावपूर्ण हो गए।

सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.) –

विद्रोही महपा जिसको मालवा के सुल्तान ने शरण दे रखी थी, कुम्भा ने उसे लौटने की माँग की, किन्तु सुल्तान ने मना कर किया। तब 1437 ई. में कुम्भा ने एक विशाल सेना के साथ मालवा पर आक्रमण कर दिया।

वह मंदसौर, जावरा आदि स्थानों को जीतता हुआ सारंगपुर पहुँचा जहाँ युद्ध में सुल्तान महमूद खिलजी की हार हुई। कुम्भा ने महमूद खिलजी को बन्दी बनाया और उदारता का परिचय देते हुए उसे मुक्त भी कर दिया।

महाराणा कुम्भा सारंगपुर से गागरौन मंदसौर आदि स्थानों पर अधिकार करता हुआ मेवाड़ लौट आया।

कुंभलगढ़ एवं चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण –

सुल्तान ने प्रथम आक्रमण 1442-43 ई. में किया जब महाराणा बूँदी की ओर वयस्त था। कुम्भा का विद्रोही भाई खेमकरण मालवा के सुल्तान की शरण में पहले ही जा चुका था, जिससे सुल्तान को पर्याप्त सहायता मिली।

उसी समय गुजरात के शासक अहमदशाह की मृत्यु भी हो गई थी। उसका उत्तराधिकारी महमूदशाह काफी निर्बल था। अतएव गुजरात की ओर से मालवा को आक्रमण का डर नहीं रहा।

मेवाड़ के सेनापति दीपसिंह को मार कर वाणमाता के मंदिर को नष्ट-भ्रष्ट किया। इतने पर भी जब यह दुर्ग जीता नहीं जा सका तो शत्रु-सेना ने चित्तौड़गढ़ को जीतना चाहा। लेकिन चित्तौड़गढ़ विजय की उसकी यह योजना सफल नहीं हो सकी और महाराणा ने उसे पराजित कर मांडू भगा दिया।

गागरौन विजय –

मालवा के सुल्तान ने नवम्बर 1443 ई. में गागरौन पर आक्रमण किया। गागरौन खींची चौहानों के अधिकार में था। मालवा और हाड़ौती के बीच होने से मेवाड़ और मालवा के लिए इस दुर्ग का बड़ा महत्व था।

इसलिए खिलजी ने आगे बढ़ते हुए 1444 ई. में इस दुर्ग को घेर लिया और सात दिन के संघर्ष के बाद सेनापति दाहिर की मृत्यु हो जाने से राजपूतों का मनोबल टूट गया और गागरौन पर खिलजी का अधिकार हो गया।

अजमेर मांडलगढ़ अभियान –

पहले की हार का बदला लेने के लिए अगले ही वर्ष 1455 ई. में सुल्तान ने कुम्भा के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ किया। मंदसौर पहुँच ने पर उसने अपने पुत्र गयासुद्दीन को रणथम्भौर की ओर भेजा और स्वयं सुल्तान ने जाइन का दुर्ग जीत लिया।

अजमेर उस समय कुम्भा के पास में था और उसके प्रतिनिधि के रूप में राजा गजधरसिंह वहाँ की प्रशासनिक व्यवस्था को देख रहा था।

सुल्तान को इस बार भी पराजित होकर मांडू लौटना पड़ा था। 1457 ई. में वह मांडलगढ़ लेने के लिए फिर इधर आया।

अक्टूबर 1457 ई. में उसका मांडलगढ़ पर अधिकार हो गया। कारण कि उस समय कुम्भा गुजरात से युद्ध में व्यस्त था किन्तु शीघ्र ही उसने मांडलगढ़ को पुनः हस्तगत कर लिया।

कुम्भलगढ़ आक्रमण –

मालवा के सुल्तान ने 1459 ई. में कुम्भलगढ़ पर फिर आक्रमण किया। इस युद्ध में महमूद को गुजरात के सुल्तान ने भी सहायता दी थी, किन्तु सफलता नहीं मिली।

मेवाड़ गुजरात संघर्ष –

कुम्भा का गुजरात से भी संघर्ष होता है और नागौर के प्रश्न ने दोनों को आमने-सामने ला खड़ा कर दिया। नागौर के तत्कालीन शासक फिरोज खां की मृत्यु होने पर और उसके छोटे पुत्र मुजाहिद खां द्वारा नागौर पर अधिकार करने हेतु बड़े लड़के शम्सखां ने नागौर प्राप्त करने में कुम्भा की सहायता माँगी।

कुम्भा को इससे अच्छा अवसर क्या मिलता। वह एक बड़ी सेना लेकर नागौर पहुँचा। मुजाहिद को वहाँ से हटा कर महाराणा ने शम्सखां को गद्दी अपर बिठाया परन्तु गद्दी अपर बैठते ही शम्सखां पाने सारे वादे भूल गया और उसने संधि की शर्तों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया।

स्थिति की गंभीरता को समझ कर कुम्भा ने शम्सखां को नागौर से निकाल कर उसे अपने अधिकार में कर लिया। शम्सखां भाग कर गुजरात पहुँचा और अपनी लड़की की शादी सुल्तान से कर, गुजरात से सैनिक सहायता प्राप्त कर महाराणा की सेना के साथ युद्ध करने को बढ़ा परन्तु विजय मेवाड़ की हुई।

मेवाड़-गुजरात संघर्ष का यह तत्कालीन कारण था। 1455 ई. से 1460 ई. के बीच मेवाड़-गुजरात संघर्षों के दौरान निम्नाकिंत युद्ध हुए –

1. नागौर युद्ध –

नागौर के पहले युद्ध में शम्सखां की सहायता के लिए भेजे गए गुजरात के सेनापति रायरामचंद्र व मलिक गिदई महाराणा कुम्भा से हार गए थे।

इसलिए इस हार का बदला लेने तथा शम्सखां को नागौर की गद्दी पर बिताने के लिए 1456 ई. में गुजरात का सुलान कुतुबुद्दीन ससैन्य मेवाड़ पर बढ़ आया।

तब सिरोही को जीतकर कुम्भलगढ़ का घेरा डाल दिया किन्तु इसमें उसे असफल होकर लौटना पड़ा। इस प्रकार प्रथम युद्ध में नागौर पर राणा की जीत हुई और उसने नागौर के किले को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

2. सुलान कुतुबुद्दीन का आक्रमण –

सिरोही के देवड़ा राजा ने सुल्तान कुतुबुद्दीन से प्रार्थना की कि वह आबू जीतकर सिरोही उसे सुपुर्द कर दे। सुल्तान ने इसे स्वीकार कर लिया। आबू को कुम्भा ने देवड़ा से जीता था।

सुल्तान ने अपने सेनापति इमादुलमुल्क को आबू पर आक्रमण करने भेजा किन्तु उसकी पराजय हुई। इसके बाद सुजान ने कुम्भलगढ़ पर चढ़ाई कर तीन दिन तक युद्ध किया।

बेले ने इस युद्ध में कुम्भा की पराजय बताई है किन्तु गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, हरबिलास शारदा ने इस कथन को असत्य बताते हुए कुम्भा की जीत ही मानी है।

उनका मानना है कि यदि सुल्तान जीत कर लौटता तो पुनः मालवा के साथ मिलकर मेवाड़ पर आक्रमण नहीं करता। सुल्तान का दूसरा प्रयास भी असफल रहा।

3. मालवा-गुजरात का संयुक्त अभियान –

गुजरात एवं मालवा के सुल्तानों ने चांपानेर स्थान पर समझौता किया। इतिहास में यह चांपानेर की संधि के नाम से जाना जाता है इसके अनुसार दोनों की सम्मिलित सेनाएँ मेवाड़ पर आक्रमण करेंगी तथा विजय के बाद मेवाड़ का दक्षिण भाग गुजरात में तथा शेष भाग मालवा में मिला लिया जाएगा।

कुतुबुद्दीन आबू को विजय करता हुआ आगे बढ़ा और मालवा का सुल्तान दूसरी ओर से बढ़ा। कुम्भा ने दोनों की संयुक्त सेना का साहस के साथ सामना किया और कीर्ति स्तम्भ-प्रशस्तिरसिक प्रिया के अनुसार कुम्भा विजयी रहा।

4. नागौर विजय –

कुम्भा ने 1458 ई. में नागौर पर आक्रमण किया जिसका कारण श्यामलदास के अनुसार –

(1) नागौर का हाकिम शम्सखां और मुसलमानों द्वारा गौ-वध बहुत होने लगा था।

(2) मालवा के सुल्तान के मेवाड़ आक्रमण के समय शम्सखां ने उसकी महाराणा के विरुद्ध सहायता की थी।

(3) शम्सखां ने किले की मरम्मत शुरू कर दी थी।

अतः महाराणा ने नागौर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया।

5. कुम्भलगढ़ अभियान –

कुतुबुद्दीन का 1458 ई. में कुम्भलगढ़ पर अंतिम आक्रमण हुआ जिसमें उसे कुम्भा से पराजित होकर लौटना पड़ा। तभी 25 मई, 1458 ई. को उसका देहान्त हो गया।

6. महमूद बेगडा का आक्रमण –

कुतुबुद्दीन के बाद महमूद बेगडा गुजरात का सुल्तान बना। उसने 1459 ई. में जूनागढ़ पर आक्रमण किया। वहाँ का शासक कुम्भा का दामाद था। अतः महाराणा उसकी सहायतार्थ जूनागढ़ गया और सुल्तान को पराजित कर भगा दिया।

महाराणा कुम्भा के विरुद –

विभिन्न प्रशस्तियों, टीकाओं एवं अभिलेखों में महाराणा कुम्भा को विभिन्न विरुदों से सुशोभित किया गया है जैसे महाराजाधिराज, रायरायां, चाप गुरु, दान गुरु (महादानी), हाल गुरु (पहाड़ी दुर्गों का स्वमी), परमगुरु, रावराय, राज गुरु (राजनीति में दक्ष), राणोरासा (साहित्यकारों का आश्रयडाटा) आदि।

उन्होंने अश्वपति, गजपति, छाप गुरु (छापामार युद्ध में पारंगत), नरपत आदि सैनिक कौशल अभिव्यक्त करने वाले विरुद भी धारण कर रखे थे।

महाराणा कुम्भा का शिल्प, संगीत व साहित्य  –

महाराणा कुम्भा शिल्पशास्र के ज्ञाता होने के साथ-साथ शिल्प कार्यों के भी बड़े प्रेमी थे। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने मेवाड़ में 32 किले, अनेक मंदिर व जलाशय बनवाए।

कुम्भा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में 1448 ई. में कुम्भश्याम मंदिर, आदिवराह मंदिर, 1459 ई. में कुम्भलगढ़ दुर्ग (1443 ई. से 1459 ई. में), कुम्भस्वामी मंदिर आदि बनवाए तथा एकलिंगजी के मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

बसन्तपुर (सिरोही राज्य में) नगर को, जो पहले उजड़ गया था, उन्होंने फिर बसाया और वहाँ पर बसंतगढ़ दुर्ग का पुनर्निर्माण कराया एवं विष्णु के निमित्त 7 जलाशयों का निर्माण कराया।

कुम्भलगढ़ दुर्ग का प्रमुख शिल्पी मंडन था। दुर्ग के भीतर कुम्भा ने कटारगढ़ बनवाया जो कुम्भा का निवास स्थान था।

कुम्भलगढ़ प्रशस्ति का रचयिता कवि महेश (महेश्वर) ही था। महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित देवालय स्थापत्य की परम्परागत शैली के हैं। इनकी विशालता एवं तक्षणकला विलक्षण है।

कुम्भा द्वारा निर्मित स्तंभ को वास्तुकारों ने विष्णु ध्वज तथा इतिहासकारों ने विजयस्तंभ (कीर्तिस्तंभ) की संज्ञा दी है। विजय स्तंभ की ऊँचाई अनुमानतः 122 फीट है। जिसमें चढ़ने हेतु घुमावदार सीढ़िया है। स्तंभ के मुख्य द्वार पर भगवान विष्णु की प्रतिमा विराजमान है।

कुम्भा के समय सुपासनाह चरियम नामक ग्रंथ चित्रित किया गया था। उनके काल में चित्रों में प्रयुक्त रंगों में स्वर्ण चूर्ण का प्रयोग किया जाता था।

उन्होंने संगीतराज, संगीतमीमांसा एवं सूड प्रबंध नामक संगीत ग्रन्थ, चंडीशतक की व्याख्या (टीका), गीतगोविन्द पर रसिकप्रिया नाम की टीका एवं संगीत रत्नाकर की टीका, कामराजरतिसार नामक पुस्तकें लिखी।

महाराणा कुम्भा का देहान्त –

ऐसे वीर, प्रतापी, विद्वान महाराणा का अंत बहुत दुःखद हुआ। उसके पुत्र ऊदा या उदयसिंह ने उसकी हत्या 1468 ई. में कर दी और स्वयं गद्दी पर बैठ गया कुम्भा की मृत्यु के साथ ही सम्पूर्ण कला, साहित्य, शौर्य आदि की परम्परा की गति में अवरोध आ गया।

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